‘Main Tumhari Khushbu Mein Page’, a poem by Indu Jain

मैं तुम्हारी ख़ुशबू में पगे
अपने आँचल से डर गयी हूँ,
साँप की तरह
गुंजलक में लपेट
दंश कर लेता है मन पर
रगों में बेहोशी के झरने बहाता है,
सुलाता है।

इस आँचल की तेजोमयी आँखों से
मन्त्रमुग्ध हिरनी सी
बँधी हुई
खड़ी हूँ।

व्याध या वधिक की
दिशा से अजानी
मृत्यु के वृत्त में
काले मोती सी
जड़ी हूँ।

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