गए बरस की ईद का दिन क्या अच्छा था
चाँद को देखके उसका चेहरा देखा था
फ़ज़ा में ‘कीट्स’ के लहजे की नरमाहट थी
मौसम अपने रंग में ‘फ़ैज़’ का मिसरा था

दुआ के बे-आवाज़ उलूही लम्हों में
वो लम्हा भी कितना दिलकश लम्हा था
हाथ उठाकर जब आँखों ही आँखों में
उसने मुझको अपने रब से माँगा था

फिर मेरे चेहरे को हाथों में लेकर
कितने प्यार से मेरा माथा चूमा था!

हवा! कुछ आज की शब का भी अहवाल सुना
क्या वो अपनी छत पर आज अकेला था?
या कोई मेरे जैसी साथ थी और उसने
चाँद को देखके उसका चेहरा देखा था?

परवीन शाकिर की नज़्म 'सिर्फ़ एक लड़की'

Book by Parveen Shakir:

Previous articleमुलाक़ाती
Next articleबाहरी स्वाधीनता और स्त्रियाँ
परवीन शाकिर
सैयदा परवीन शाकिर (नवंबर 1952 – 26 दिसंबर 1994), एक उर्दू कवयित्री, शिक्षक और पाकिस्तान की सरकार की सिविल सेवा में एक अधिकारी थीं। इनकी प्रमुख कृतियाँ खुली आँखों में सपना, ख़ुशबू, सदबर्ग, इन्कार, रहमतों की बारिश, ख़ुद-कलामी, इंकार(१९९०), माह-ए-तमाम (१९९४) आदि हैं। वे उर्दू शायरी में एक युग का प्रतिनिधित्व करती हैं। उनकी शायरी का केन्द्रबिंदु स्त्री रहा है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here