‘Chauthi Aurat’, a poem by Vishal Andhare

कौन थी वह चौथी औरत
जो कहना चाहती थी बहुत कुछ
जिसका कहना था-
पहली स्त्री ने ज़ुबान के तालों में
बसर की ज़िन्दगी,
और दूसरी, घूँघट में रही जीवनभर,
तीसरी, जब सुबह
करती थी सूर्य को नमन
तब ही वो देख पायी थी पूरा आसमान,
शायद यहीं से लिया होगा
उसने उर्जा भरा तेज
और उषाकाल में जन्म हुआ होगा
इस चौथी औरत का

जिसने तोड़ा था ज़ुबानी ताला,
उतार फेंका था घूँघट,
सूरज को अपने में समा
वो बन गयी है रोशनी,
जिससे वह शायद
मिटा सकती है तीनों औरतों के
जीवन से अंधकार,
लड़ सकती है अपने अधिकार के
लिए,
इतिहासी पन्नों के जुल्मभरे पन्नों
को देकर अग्नि, वो फूँक सकती है
अन्याय से भरे सारे दस्तावेज़,
लम्बी साँस लेना भी सीख गयी है,
मनुकाल के रेंगते साँप फुँफकारकर
कर सकते हैं उसे मूर्छित
या पुरुषत्वधारी बिच्छू कहीं मार
न दे संस्कृति के नाम पर धमकीले डंक
या उसपर छोड़ी जा सकती है
बदचलन नाम से ज़हरीली गैस
या कुल्टा, बाज़ारू के सम्बोधन के
नुकीले पत्थर मार उसे कर दिया
जा सकता है घायल
या उसकी पीठ पर पड़ सकती है
धर्म के मार की दहशती धर्म लाठी
या मार मार के उसके सम्मान को
दबोची जा सकती उसकी उड़ान

फिर भी ये
चौथी औरत नहीं घबराती,
उसके आस है शिक्षा की मज़बूत
जीवनदायनी अमृत प्याली
और बेड़ियों को खोलने की
मज़बूत मंशा
और भेड़ियों के ख़िलाफ़ लड़ने
का जज़्बा

चौथी औरत मज़बूती से डटकर
लड़ेगी सब से,
वो बस इन तीन औरतों को ही
सिर्फ़ बचाना नहीं चाहती,
उसे तो ये भी चिंता है कि
पाँचवीं औरत को
ये समाज फिर से न बना दे
पाँचाली…

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