छली हुई स्त्रियाँ

‘Chhali Hui Striyaan’, a poem by Rashmi Saxena

उसके चेहरे को चाँद कहा गया
और निगल लिया गया
अमावस के स्याह अंधकार में
रात के सौदागरों के द्वारा

उन्हें बताया गया साक्षात
देवी का प्रतिरूप और सजा दिया गया
मंदिरों के शोभा घरों में
अब वे प्रतिबंधित है हँसने, बोलने,
रोने, व अभिव्यक्ति की क्रियाओं से

बलिदान और त्याग की
प्रतिमा का नाम दिया गया
अलग कर दिया गया सर धड़ से
डाल दी गयी आत्मा के पैरों में बेड़िया

उन्हें बहन बेटी माँ उपनामों से
सुशोभित किया गया
काट छाँटकर प्रथक कर दिया गया
उनकी पहचान से उनके नाम को

प्रेम पाश में बाँधकर
प्रेमिका कहा गया उन्हें
छोड़ दिया गया अश्रुओं के
घने जंगलों में
आश्वासन की स्याही से
लिखकर उनके माथे पर प्रतीक्षा

परम्पराओं की हवन वेदी में
आहुति दी गयी उनके
सपनों महत्वकांक्षाओं और
स्वतंत्रता की,
और बाँध दिए गये उनके पाँव
देहरी के दोनों छोरों से

सभी सरल स्त्रियाँ
घर की दीवारों पर छल से
गाड़ी हुई कीलें हैं जिन पर
टंगी हैं समाज के ठेकेदारों की
मन चाहें फ्रेम में जड़ी हुई तस्वीरें

सीधी गड़ी हुई कील
तस्वीर टाँगने का सबसे
उपयुक्त स्थान है

और थोड़ी टेड़ी हुई कील
पतनशील स्त्रियाँ होतीं हैं…!!

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