छुपा हुआ मुँह और खुला खेल

‘Chhupa Hua Muh Aur Khula Khel’, Hindi satire by Nirmal Gupt

स्कार्फ़ या दुपट्टे से मुखड़ा छिपा लेना मेरे शहर की अधिकांश फैशनेबल रूपसियों के लिए फ़ैशन स्टेटमेंट है। कुछ दिलफेंक लोगों का कहना है कि यह फैशन-वैशन नहीं, सिर्फ़ बढ़ती हुई उम्र के चलते चालाकी से भरी एहतियात भर है। कहने वाले तो यहाँ तक कहते पाए गये हैं कि बात केवल इतनी ही नहीं है, यह वातावरण में मौजूद प्रदूषित गर्दोगुबार से बचाने वाला ज़रूरी इकोफ्रेंडली गैजेट भी है। पर असल मसला तो इससे ज़रा हटकर है।

हाल ही में आये कुछ गेम चेंजर अदालती फ़ैसलों की वजह से अब प्यार नामक सनसनीखेज़ खेल खुला खेल फरुक्खाबादी जीवन मूल्यों का सूत्रवाक्य बनने को है। कहने वाले यही कहते हैं कि मुँह छुपाने में जिस प्रकार का रहस्य, रोमांच और मज़ा निहित है, उसका कोई विकल्प नहीं।

छोटे नगरों, उपनगरों और क़स्बों में लड़कियाँ तो लड़कियाँ, लड़के भी गमछे से मुँह ढाँपकर बाइक पर दनदनाते देखे जा सकते हैं। लोगों का मानना है ये गमछा बहुआयामी आवरण है। यह सिर्फ़ मुँह की हिफाज़त नहीं करता, गले में लटका लो तो धारक को देशज संस्कृति का जुझारू और स्वयम्भू पहरुआ भी ख़ुद-ब-ख़ुद बना देता है। गमछाधारी भईयाजी को यह हक़ बायडिफॉल्ट मिल जाता है कि किसी को कहीं पर भी बात-बेबात लठिया लें।

इस पर्देदारी के चलते वास्तविक व्यवहारगत असमंजस दरअसल लफंगों को है। उनकी तो अभिव्यक्ति की आज़ादी चेहरे की इस छुपम-छुपाई के चलते संकट में आ घिरी है। वे सही मौक़े पर समझ ही नहीं पाते कि कौन सी फ़बती किस चेहरे को लक्ष्य कर दागना समुचित रहेगा। उन्हें शिकायत है कि मुँह छुपाई के चलते शाब्दिक छेड़खानी के लिए स्पेस ही नहीं बची। वे गुंडे लफंगे भले ही हों लेकिन मुँह में ज़ुबान तो रखते ही हैं।

उनके मौलिक अधिकार का तो तकाज़ा यही है कि और चाहे जो हो पर उनकी डेढ़ तोले की जिह्वा कतरनी की तरह बेलाग चलती रहे। वे कई बार इस मामले पर गहन चिंतन के लिए सुनसान इलाके में हथेलियों पर सुल्फे की पत्तियों को रगड़ते हुए एकत्र भी हुए। लेकिन किसी नतीजे तक पहुंचे बिना उनकी सभा विसर्जित हो गयी। अंतत: उलझन यह रही कि इस जटिल समस्या से पार पाया जाए तो भला कैसे पाया जाए।

जानकार बताते हैं कि मुँह ढाँपना एक अप्रतिम कला है। इससे ताक झाँक करने वालों के मन में संशय बना रहता है। सुन्दरता का अनुमान लगाने के लिए कल्पना के घोड़े दौड़ाने पड़ते हैं। सयानों का कहना है कि पर्देदारी की कला का सम्यक इस्तेमाल करना रसीले फलों के विक्रेताओं से बेहतर कोई नहीं जानता। उन्हें मालूम है कि समय रहते, इन्हें ठीक से ढँका न जाए तो उन पर मक्खियाँ भिनकने लगती हैं। एक तरह से देखा जाए तो मुँह छिपाना कुत्सित निगाहों से स्वयं को केवल बचाना नहीं, अलबत्ता अभद्र लोगों को बड़े सलीके से मुँह चिढ़ाना भी है। वैसे होने को तो यह मेकअप के विभिन्न सामानों की लगातार बढ़ती हुई क़ीमतों के ख़िलाफ़ कारगर उपाय भी है। बार-बार मुँह धोने में खर्च होने वाले जल, साबुन और वक़्त की बचत तो खैर है ही।

मुँह ढक लेने के बाद निजता की शिनाख़्त हड़प्पा लिपि वाली अबूझ पहेली में तब्दील हो जाती है। मेरे शहर की बालाएँ यह रहस्य शायद नहीं जानतीं।पर सच तो अंतत: यही है।

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