दुःख भरे दिनों में वे गातीं उदासी के गीत
सुख से लदे दिनों की धुन भी जाने क्यों उदास ही होती

कामनाओं में लिपटी छोटी-छोटी प्रार्थनाएँ
उनकी इच्छाओं की भाँति ही छोटी थीं
वे गाते हुए उकेरती कुछ आकृतियाँ
रसोई की दीवारों पर
जिसे गढ़ा था सभ्यता की पहली स्त्री ने

देवालय से निर्वासित यह देवता स्त्री
स्त्रियों के हिस्से आयी एकमात्र धरोहर थी
जिसे पूरब की माँओं ने बाँध दिया था बेटियों के
खोंइचे से, विदा के वक़्त

केवल माएँ जानती थीं कि जब कोई नहीं होगा उदासी के आँगन में
तब यह देवी ही होगी उनके पास
जिसकी गोद में सर रख वे कर देंगी विसर्जित
अपने अनावृत दुःखों को

रात-भर जाग वे बनातीं प्रसाद
रखतीं उपवास और माँगतीं सौभाग्य—
सौभाग्य जिसे छोड़ आयी थीं पिता की देहरी पर
फेंकते हुए हथेलियों से चावल कि भरा रहे मायका

उनके मन का भीतरी कोठर ख़ाली ही रहा
जी की सारी साध लिए उन्होंने उकेर दी दीवारों पर
जीवन-भर की प्यास
गीतों में फूट पड़ी अबोली पीड़ाएँ
स्वरों से बह निकली नदी की धार

माँओं ने कहा था धीरे से कानों के पीछे
कि कह देने से तिरोहित हो जाता है सारा दाह
मन का… तन का…

(पूर्वांचंल में देवी के लिए एक उपवास होता है जिसमें स्त्रियाँ रात-भर जागकर पक्का खाना बनाती है और देवी को चढ़ाते हुए कई गीत गाती हैं आशीर्वाद माँगती हैं)
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