कुछ जोड़ी चप्पलें

उन्हें फ़र्क़ नहीं पड़ता कि
मनुष्य होने के दावे कितने झूठे पड़ चुके थे
तुम्हारी आत्म संलिप्त दानशीलता के बावजूद,
थोड़ा-सा भूगोल लिए आँखों में
वे बस पहचानते थे
घर जाने वाली दिशा को

तुम्हारे दिशा सूचक यंत्र भरभरा के ढह चुके थे

उन्हें फ़र्क़ नहीं पड़ता
कि यह एक ऐतिहासिक घटना थी
कि मनुष्य ने सीख लिया था दिशाओं को परखना,
उनके लिए हर दिशा दक्षिण दिशा ही थी

उनके पाँव में लिखी अनंत यात्राओं को
कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता तुम्हारी विजय गाथाओं से
तुमने इतिहास बदल दिए उनके हाथों के भरोसे
और वे इतिहास से ख़ारिज ‘बन्दर’ ही कहलाए

उन्हें फ़र्क़ नहीं पड़ता
कि तुम्हारी सभ्यता के सूत्र हज़ारों साल पुराने हैं
जिसकी सबसे ऊँची मीनार पर बैठा एक काला कौवा
जिसके पास काँव-काँव से अधिक कुछ भी नहीं…
सच, उन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता…

उतरती शाम के सन्नाटे और यात्रा की अन्तहीनता ने
छीन लिया था उनकी आत्मा के दुःखों को
नहीं था समय उनके पास दुःखी होने का भी
पाँव के फफोले उनके चेहरों पर उग आए थे
कमर सबकी एक जैसी, काँधे बोझ से दबे हुए
उन्हें फ़र्क़ नहीं पड़ता तुम्हारी सदियों पुरानी महान संस्कृति से
उन्हें तो बस ज़रूरत थी तुम्हारी जर्जर मनुष्यता को
बचाने के लिए कुछ जोड़ी चप्पलों की…

इमाम दस्ता

इमाम दस्ता
लोहे का था एक मेरे पास
नानी के ज़माने का,
माँ ने बड़े जतन से रखा था सम्भाल
कि एक रोज़ मुझे सौंप देंगीं ब्रह्म बेला में
और हुआ यूँ कि एक दिन सच में
सौंप दिया माँ ने लोहे का इमाम दस्ता

कहती थी माँ कि नानी की माँ ने दिया था नानी को
और नानी की माँ को उनकी माँ ने,
पीढ़ियाँ बदल गयीं पर इमाम दस्ता न बदला
न ही बदली उसकी जगह
वह स्त्रियों के जीवन में सदियों से शामिल रहा
सदियों तलक,
ज़ंग न लगे तो लोहा, लोहा ही बना रहता है हमेशा
कहती थीं नानी देते हुए हिदायत कि देखो
ज़ंग न लगने पाए कभी

बड़े ज़ोर देने पर देख पाती हूँ माँ के घर में
उसका इस्तेमाल
लाल सूखी मिर्च की झाँपी के पीछे
माँ का मिर्च से जलता लाल चेहरा,
पोछते हुए आँख का पानी वो कूटती जाती
एक के बाद एक मसाले,
सूप में पछोरकर अलग करती जाती
मसालों की कनकियाँ,
पर नहीं कर पायी अपने जीवन की कनकियों को
पछोरकर ख़ुद से अलग
वे मसालों में मिलावट की तरह शामिल रहे
उसके जीवन में

दिनों महीनों सालों की उसकी मेहनत ने
हमेशा ज़िन्दा रखा हमारे स्वादों को और हम
कम नमक के आधार पर तय करते रहे होना उसका

और एक दिन
घर के सारे स्वादों को भर कर इमामदस्ते में
सौंप दिया उसने मुझे अपना हाथ
ये बताते हुए कि कितना भी कूट लो मसालों को
इमाम दस्ते में
स्त्रियों के जीवन से लोहे का स्वाद नहीं जाता
नहीं ही जाता…

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