दादी माँ

‘Dadi Maa’, a poem by Kailash Manhar

सीलन भरी कोठरी के
अँधेरे कोने में
कुछ चिथड़े बिखरे हैं
लाल, पीले, काले, सफ़ेद
सादे और फूलोंदार
घाघरे लूगड़ी और
सूती धोतियाँ पेटीकोट

कुछ अपने बिसाये
कुछ पीहर से लाये
कुछ हाथ के सीये
कुछ बेटे बहुओं के दिये

ऐरे की चौड़ी पत्तियों से बनी
एक खरोली है जिसमें
रखा है मोटे काँचो वाला टूटे फ्रेम का चश्मा
और नियोस्प्रीन आई ओइन्टमेंट की
पाँच ग्राम वाली पिचकी हुई ट्यूब
जिन्हें कि अपनी
दुनिया को देखते रहने की अदम्य
लालसा के वशीभूत
आँखों की सलामती के लिये
सम्भाले रखती है दादी माँ

दादी माँ सठियाने-सी लगी है
पोतों और पतोहुओं की दृष्टि में कि
ज़माना बदल रहा है और
उसे अब भी पसन्द है
साइकिल के टायर की डसों वाली
सस्ती और घटिया चप्पलें

दादी माँ नहीं जानती कि
घर में ही चला लेती हैं अब
बेटियाँ और बहुयें सिलाई मशीन और
छाती ढँकने के ब्लाउज़ बन जाते हैं
सिर्फ़ पैंसठ सेंटीमीटर कपड़े में

दादी माँ ने
अब तक धर रखी है
छींके से लटकती कोथळी में
धागे की अँटी और
गूदड़े सींने वाली
बड़ी नोक की सूई
जिसमें धागा पिरो सकना ही है
आँखों की सलामती की
पक्की पहचान

घर में भरे होने के बावज़ूद
चीनी के डिब्बे
दादी माँ ढूँढती रहती है
आले-दीवाळे में गुड़ की डळी तो
बहू-बेटियों को खाक़ होती लगती है
घर की इज़्ज़त-आबरू

दादी माँ की जीभ
फिरने लगती है होंठों पर
सरसों, मेथी, चौंळाई
और बथुए के साग के लिये
जबकि बहुयें छौंकती हैं
हर रोज़
आलू, भिण्डी और मटर-पनीर
तेज़ मसाले में

बहुयें नहीं जानती कि
कितना गुणकारी होता है ग्वारपाठा
बादी कम करने में बज़ाय
डाइज़ीन की गोलियों के

बहुयें जल्दी सोती हैं और
सुबह बहुत देर से जागती हैं अक्सर
लेकिन
बहुओं के जागने से
बहुत देर पहले
आसमान के तारों की
निशानदेही के साथ
बड़े तड़के ही उठ जाती है
दादी माँ

अलार्म घड़ी की
टनटनाहट के भरोसे
जागने वाला
जलदाय विभाग का कर्मचारी
दादी माँ के नहाने के
बहुत देर बाद खोलता है
शहर के नलों की लाइन

दादी माँ जब जागती है तब
सोया हुआ होता है
रात की गश्त का सिपाही
और चुप होने लगते हैं
भौंकते हुए कुत्ते
जबकि सूरज
सिर पर आ जाता है
तब कहीं
जा कर बोलते हैं राष्ट्रभक्त
भारत माता की जय!

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