भागकर अकेलेपन से अपने
तुम में मैं गया।
सुविधा के कई वर्ष
तुमने व्यतीत किए।
कैसे?
कुछ स्मरण नहीं।

मैं और तुम! अपनी दिनचर्या के
पृष्ठ पर
अंकित थे
एक संयुक्ताक्षर!

क्या कहूँ! लिपि की नियति
केवल लिपि की नियति
थी –
तुम में से होकर भी,
बसकर भी
संग-संग रहकर भी
बिलकुल असंग हूँ।

सच है तुम्हारे बिना जीवन अपंग है
लेकिन! क्यों लगता है मुझे
प्रेम
अकेले होने का ही
एक और ढंग है।

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श्रीकान्त वर्मा
श्रीकांत वर्मा (18 सितम्बर 1931- 25 मई 1986) का जन्म बिलासपुर, छत्तीसगढ़ में हुआ। वे गीतकार, कथाकार तथा समीक्षक के रूप में जाने जाते हैं। ये राजनीति से भी जुड़े थे तथा राज्यसभा के सदस्य रहे। 1957 में प्रकाशित 'भटका मेघ', 1967 में प्रकाशित 'मायादर्पण' और 'दिनारम्भ', 1973 में प्रकाशित 'जलसाघर' और 1984 में प्रकाशित 'मगध' इनकी काव्य-कृतियाँ हैं। 'मगध' काव्य संग्रह के लिए 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' से सम्मानित हुये।