गोरी चमड़ी

वो धूप में सेंकती है
अपनी परछाईं
और छाँव के अंधेरे में
किस्मत के पाँव

हाथ लम्बे हैं उसके
किस्मत बौनी

वो जानती है
मुश्किलों पर झाड़ू लगाना

चाय भी पीती है
अपनी कड़वी जुबान से

अब एक नया काम वो रोज़ करती है
अपनी गोरी चमड़ी को
धूप में काला करती है

क्योंकि रात के अंधेरे में
फुटपाथ पर मंडराते हैं
वहशियत के काले साये

वो बनना
नहीं चाहती शिकार

दिन की धूप में जब
धुएँदार कारखानों से निकलते हैं
काले बादल
वो रात में उन्हें
ओढ़कर सोना चाहती है
उस अंधकार में

कुछ दिनों बाद शायद
वो घिसना शुरू कर सकती है
बड़े पत्थर से गोरी चमड़ी
और लहूलुहान भी कर सकती
है वो उस चमड़ी को

उसे अपने रक्त से लाल कर
लाल रंग दे सकती है वो

पर
वो बचना
चाहती है

उन रात की
वहशियत भरी नजरों से

जिनके कारण
दिनभर की थकान के
बावजूद
वो ले नहीं सकी है
सुकून भरी नींद!

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