इस गली के मोड़ पर इक अज़ीज़ दोस्त ने
मेरे अश्क पोंछकर
आज मुझसे ये कहा—
यूँ न दिल जलाओ तुम
लूट-मार का है राज
जल रहा है कुल समाज
ये फ़ुज़ूल रागनी
मुझको मत सुनाओ तुम
बुरज़वा समाज है
लूट-मार चोरियाँ इस का वस्फ़-ए-ख़ास है
इसको मत भुलाओ तुम
इंक़लाब आएगा
उससे लौ लगाओ तुम
हो सके तो आजकल माल कुछ बनाओ तुम
खाई से निकलने की आरज़ू से पेश-तर
देख लो ज़रा जो है दूसरी तरफ़ है गढ़ा है
आज हैं जो हुक्मराँ उनसे बढ़ के ख़ौफ़नाक उनके सब रक़ीब हैं
दनदना रहे हैं जो ले के हाथ में छुरा
शुक्र का मक़ाम है
मेरी मस्ख़ लाश आप को कहीं मिली नहीं
इक गली के मोड़ पर
मैंने पूछा वाक़ई
सुन के मुस्कुरा दिया कितनी देर हो गई
लीजिए मैं अब चला उसके बाद अब क्या हुआ
खड़खड़ायीं हड्डियाँ
उस गली के मोड़ से वो कहीं चला गया!

फ़हमीदा रियाज़ की नज़्म 'तुम बिलकुल हम जैसे निकले'

Book by Fahmida Riaz:

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फ़हमीदा रियाज़
फ़हमीदा रियाज़ उर्दू की प्रमुख शायरा एवं लेखिका हैं। इनका जन्म 28 जुलाई 1946 को मेरठ में हुआ। बाद में इनका परिवार पाकिस्तान जाकर बस गया। गोदावरी, ख़त-ए-मरमुज़ इनके प्रमुख संग्रह हैं। 1980 के दौर में पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल जिया उल हक के शासन में उनको और उनके पति को निर्वासन के बाद भारत में शरण लेनी पड़ी थी।

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