सुनो!
जब जाना तो इस तरह मत जाना
कि कभी लौट न सको उन्हीं रास्तों पर वापस
जाते हुए गिराते जाना रास्ते में ख़त का पुर्ज़ा, कोई फूल या आँसू ही
और छोड़ते जाना एक शिशु देह गन्ध
जिससे तमाम रास्ते याद रख सकें तुम्हें
और आवाज़ दे सकें अपने सीने पर फूल रोपने के लिए
सुनो!
कभी न लौटने के लिए मत जाना।

जब साँझ के धुंधलके में
तेज़ क़दम चलते हुए दुःख बैठ रहा होगा तुम्हारी रात के पैताने
और चादर की तरह फैलेगा
तब भी समय पर ही भरोसा रखना
वो हमारे घरों के आगे काली हाण्डियों-सा लटका रहेगा
उन्हें बचाएगा, दुःख की सूत उधेड़ेगा,
सुख कातेगा

सुनो, मुझे माफ़ करना मेरी जान
कि दिन के किसी वक़्त जब शहर की वीरानी चीरते हुए
निकलने वाली होगी तुम्हारी ट्रेन
मैं उस वक़्त नहीं रहूँगा, मेरी जान! नहीं रहूँगा
पिछली और उससे पिछली बार की तरह बिल्कुल नहीं
नहीं जान पाऊँगा इस बार बिछड़ने के मायने

मेरी हथेलियाँ चीखेंगी तुम्हें थामने को
और हाथ टटोलना चाहेंगे तुम्हारी गुदाज बाँहें
कि वहाँ तो नहीं पैठ गया है कोई दुःख
होंठ रखना चाहेंगे तुम्हारे माथे और आँखों पर लौट आने की दुआएँ
उँगलियाँ बांधने को होंगी तुम्हारे कांधे के घेर में एक कलावा
पर मेरी जान, कुछ नहीं होगा
तुम खिड़कियों के पार देखना
देखना वहाँ खड़ा होगा एक इंजन जिस पर घुमाने का वादा लिए लौट आया था मैं
और गले में स्कार्फ़ बाँध चली गयी थीं तुम
वक़्त की पगडण्डी पर थोड़ा पीछे जाना और देखना
कि मिलने के लिए मिलते रहने वाले
बिछड़ने के लिए नहीं मिल सके एक भी बार
देखना कि आँखों में रेत लिए निहत्था बैठा रहा मछुआरा
और जलपरी उलझकर रह गयी किसी जाल में

मेरी जान ये सब याद करना और रोक देना पृथ्वी पर समय
रेल की सीटियाँ को सुला देना
आँखें बंद करना और देखना
कि लहराने लगा है तुम्हारा स्कार्फ़ और मैं बेतहाशा चूम रहा हूँ तुम्हारी आँखें
कि जैसे ये आख़िरी प्यास हो मेरी
कि मैं नहीं जा पाऊँगा किसी और टापू के किनारे
तुम्हारे एकांत के निर्मम क्षणों में भी एकांत जितना ही रहूँगा तुम्हारे साथ
बैठा रहूँगा और फाँसूँगा दुःखों की मछलियाँ
चलूँगा और हटाता जाऊँगा साँसों पर की धूल
गिरूँगा तो उगता रहूँगा जामफल की तरह तुम्हारे आँगन में

बस हारना मत मेरी जान! हारना मत!
चलना, थकना, सुस्ताना और फिर चलने लगना
मिट्टी को बीज और पहाड़ों को रास्ता देना
आशंकाओं के मौसम में उम्मीद की कोंपल देखना और गुनगुनाते रहना

“इन काली सदियों के सर से, जब रात का आँचल ढलकेगा
जब दुःख के बादल पिघलेंगे, जब सुख का सागर छलकेगा
जब अम्बर झूम के नाचेगा, जब धरती नग़्में गाएगी 
वो सुबह कभी तो आएगी”*

बची रहना मेरी जान! जड़ों की तरह हरी रहना
जाते हुए तमाम रास्ते याद रखना
उन पर छींटते जाना उम्मीद के बीज, सींचते जाना
जाना पर
कभी न लौटने के लिए मत जाना
उगते पेड़ों को देखने के लिए लौट आना।

*साहिर लुधियानवी की नज़्म से पंक्तियाँ
शिवम चौबे की कविता 'बीना अम्मा के नाम'

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शिवम चौबे
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में परास्नातक। फिलहाल अध्ययनरत। कविताएँ लिखने पढ़ने में रूचि। संपर्क- [email protected]

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