बच्चों की हँसी, प्रेमियों का चुम्बन और कवि का विद्रोह

‘Bachchon Ki Hansi, Premiyon Ka Chumban Aur Kavi Ka Vidroh’, a poem by Anurag Anant

बच्चों की हँसी से सबसे ज़्यादा डरते हैं तानाशाह
प्रेमियों के चुम्बन तख़्तापलट की योजनाएँ हैं
माँओं के आँचल के कोने में बँधी दुआएँ
काम आएँगी तब जब सब साथ छोड़ देंगे
मैं अपने पाँव में गड़े काँटे को हवाई जहाज़ बनाऊँगा जिस दिन
चाँद की पेशानी उसी दिन चूमेगी दुनिया

सूरज सिर्फ़ आसमान में नहीं उगता
और तितलियों के पंख को सिर्फ़ पंख कहना नासमझी है
चिड़िया तिनकों के साथ सम्भावनाएँ भी बीनती है
और घोंसले के साथ उम्मीद बुनती है
रेलवे स्टेशन पर बरसों पहले मिले बदहवास बुड्ढे की याद इस वक़्त आने का क्या मतलब है?
मैं नहीं जानता!
और बहन के बिदाई के आँसुओं का मेरी हथेली पर उग आने का क्या संकेत
ये भी नहीं पता

एक बच्चा अभी मुस्कुरा रहा है
एक बच्चा अभी कल ही दवा की कमी से मर गया था
मुझे ऐसा क्यों लगता है
कि मैं प्यार की कमी से मरूँगा
और डॉक्टर की डॉक्टरी फ़ेल हो जाएगी
वो कहेगा हार्ट अटैक हुआ था इसे

मेरे शहर में बाढ़ आयी है
और आँखें सूखी हुई हैं
तुम, जिसका ज़िक्र किए बिना मेरी कोई बात कभी पूरी नहीं हुई
तुम अपने बच्चे को दूध पिला रही हो
मैं सब दुःखों के बीच ये दृश्य देखते हुए चैन से मर सकता हूँ
मेरे लिए ये न्यूनतम पागलपन ज़रूरी रहा है सदा से

मछुआरे ने नदी में जाल फेंक दिया है
और मैंने मछली के लिए प्रार्थना की है
ये ईश्वर के नाश्ते का समय है
और राजा के लिए सम्भोग का

कवि इन सबके बीच ख़ाली है
कविता लिखते हुए भीतर से एकदम ख़ाली
कवि जितना ख़ाली होता जाता है
उसमें उतना विद्रोह भरता जाता है!

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