मौसम की तसल्ली

‘Mausam Ki Tasalli’, a poem by Manjula Bist

यह पहली बार नहीं हुआ था कि
वृक्ष ने मौसम को अपने फल सौंप दिए
और वह सुनिश्चित था कि
वे ऋतुकाल के अधीन हो सभी तक पहुँचेंगे।

फिर यह कई बार हुआ कि
वृक्ष ने असमय पकाए हुए फलों को सूँघकर
अपनी छाया में खेलते मासूम से कहा-
“कभी अपना विश्वास किसी अपने को भी न सौंपना!”

मासूम ने नन्हें सीने की भीतरी कोठड़ी में
घबराकर अपना भय छिपा लिया
गोया वह उसका अंतिम भय साबित होने वाला था!

फिर हर बरस उसके सीने की बेचैनी बढ़ती गयी
मुख पर बेअदबी से पोते हुए केक को धोते हुए।
क्योंकि उसने सुन-पढ़ लिए थे कुछ क़िस्से
कि मानवों की सभ्य बस्तियों में
‘भय को बाँट देने से वह हवा में और अधिक उछाला जाता है’
जोर-जोर से चिल्ला-चिल्लाकर..
ताकि शिकायती स्वर को कोई सुन न सके।

उसने वृक्ष से लिपटकर कहा-
“तुम मेरा भय सुरक्षित करो और मैं तुम्हारा विश्वास।”
अब वह अधिक हैरान-परेशान था..
उसने पहली बार वृक्ष को मनुष्य की तरह पीठ दिखाते जो देखा था!!

इसके बावज़ूद
मौसम को तसल्ली इस बात की है
कि विश्वास व भय
मासूम की देह से बाहर अभी भी झाँकते रहते हैं!

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