चार या पाँच हज़ार सहस्र वर्ष पूर्व
महान सभ्यता की दहलीज़ पर टहलते थे
क़रीब चालीस हज़ार लोगों के सनातन सपने
जहाँ अब मोहनजोदड़ो है -मुर्दों का टीला
जीवाश्म भंगुर इतिहास के पुख़्ता गवाह होते हैं

वहाँ काला पड़ गया गेहूँ है तो
भूख और तृप्ति भी होगी
कहीं गोपन स्थानों पर
या फिर शायद खुल्लम खुल्ला होता होगा
रोटी का खेल भी
सभ्यता थी तो यह सब हुआ ही होगा

वहाँ मिले ताँबे और काँसे के बर्तन,
मुहरें, चौपड़ की गोटियाँ, माप-तोल के पत्थर,
मिट्टी की बैलगाड़ी,
दो पाटन की चक्की, कंघी,
मिट्टी के कंगन और पत्थर के औजार
और कुछ भुरभुराए कंकाल
जीवन था तो यह तो होगा ही

मोहनजोदड़ो में नहीं मिला
किसी तितली के रंगीन परों का सुराग़
पंख तौलते पक्षी की उड़ान का साक्ष्य
फूलों में बसी सुगंध का कोई सुबूत
न ताबूत में सलीके से रखी
किसी तूतनखामन की बेशकीमती देह
अलबत्ता वहाँ गुमशुदा आज के सिलसिले ज़रूर मिले

वहाँ सपने बुनने वाला न कोई करघा मिला
न कुम्हार का चाक
वक़्त की रफ़्तार पर ठहरा हुआ कोई राग
किसी कलाकार के रंगों की पिटारी
मिला ताँबे का वो आईना
जिस पर कोई अक्स कभी ठहरा ही नहीं

मोहनजोदड़ो में रीते हुए जलाशय मिले
नीचे की ओर उतरती सीढियाँ मिलीं
बोलता बतियाता बहता पानी न मिला
अलबत्ता कहते हैं
वहाँ समय की सघन गुफाओं में से
जवान मादाओं के खिलखिलाने की आवाज़ आती है

वहाँ रखे इतिहास के पन्ने
जब तब उलटते हैं
तब हिलती हैं चालीस हज़ार गर्दनें
हज़ारों साल बाद भी कोई नहीं जानता
इनकी देह और दैहिक कामनाओं का क्या हुआ
मोहनजोदड़ो में बहती हैं धूलभरी गर्म हवाएँ
अबूझ स्वरलिपि कोई-कोई गवैया अनवरत गाता है…

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निर्मल गुप्त
बंगाल में जन्म ,रहना सहना उत्तर प्रदेश के मेरठ में . व्यंग्य लेखन भी .अब तक कविता की दो किताबें -मैं ज़रा जल्दी में हूँ और वक्त का अजायबघर छप चुकी हैं . दो व्यंग्य लेखों के संकलन इस बहुरुपिया समय में तथा हैंगर में टंगा एंगर प्रकाशित. कुछ कहानियों और कविताओं का अंग्रेजी तथा अन्य भाषाओं में अनुवाद . सम्पर्क : [email protected]

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