न कुछ चाहकर भी

इस घने घुप्प अँधेरे में
आस पास गूँजता सरसराता है तुम्हारा सवाल
सन्नाटे की साँस का झोंका हो जैसे-
“आखिर मैं तुमसे चाहती क्या हूँ?”
जवाब के पहले खुद को खोजूँ
तय करूँ अपनी पहचान, मैं
कैसे जीना चाहती हूँ, अब तक तो
जीवन ने मुझे जिया
बिना माँगे दिया, जो दिया।
अब तक तो चाह
बस प्रवाह थी जीवन का
अब उसे ओर छोर से काट कर
एक नाम दूँ, उसके
पूरा होते ही फिर खुद
अधूरी हो जाने का खतरा उठाऊँ।

कैसे कैसे सवाल
तुम मुझसे पूछते हो आजकल और
छोड़ जाते हो चाह के जंगल वाली राह पर
मोड़ जाते हो मेरी दिशा
न कुछ चाह कर भी
तृप्ति के विरुद्ध।
मैं तुमसे चाहती क्या हूँ।

कुछ है हाथों से छूट कर
हर वक्त फिसलता हुआ-
पारे सा पथरीले फर्श पर बिखरता हुआ।
पकड़ लेना चाहती हूँ, तुमको
नहीं, तुम्हारे साथ।

किन्हीं दूर देशों की
यात्राओं से लौटी तुम्हारी आँखों में
अब भी स्मृतियाँ हैं
किसी और देशकाल में
जिये मरे लोगों की, हारे हुए युद्धों की
जीते गये खेलों की, उजड़ी हुई बस्तियों और
बसे हुए मेलों की

अब भी तुम्हारी आँखें क्षितिज को देखती हैं
सपनों में टटोलती हैं अनागत यात्राएँ
विगत सा वर्तमान। मुझे भेद कर
मेरे पार कहीं दूर टिकी रह जाती हैं।
उनमें झाँक कर
मैं देखती हूँ
रेतीले मैदान, रंगीन आसमान
बर्फानी चोटियाँ, कभी कभी घमासान
किसी और देशकाल में रहे हुए लोगों का
रोना और गाना, सर ताने घुड़सवारों का
पुल से गुजर जाना।

मेरे पास तो एक सिर्फ आँगन है, चौकोर
यहाँ कहाँ अँटेगा इतना बड़ा संसार
जिसमें अदृश्य होकर
मैं समाना चाहती हूँ
इधर से समेटूँ,
उधर से निकल जाएगा। यहाँ कहाँ फुरसत कि
सोचूँ, तुमसे मुझे क्या चाहिये
बिना कुछ चाहे, अतृप्ति के जंगल में
खो जाना चाहती हूँ।

चाहती हूँ जलती हुई रेत की
तलुओं में जलन, हथेलियों में
बर्फानी चोटियों की गलन
परिचित अनजानों के लिये
मन में एक चाव
देह पर घमासान युद्धों के घाव
तुमसे नहीं, तुम्हारे साथ।

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