‘Naak Toh Beharhaal Naak Hi Hai’, Vyangya in Hindi by Nirmal Gupt

मेरे चेहरे पर एक अदद नाक है। होगी ही। होनी ही है। अभी तक कोई ऐसी तकनीक विकसित भी नहीं हुई कि उसे जहाँ-तहाँ या मनचाही जगह पर प्लेस किया जा सके। पोर्टेबल नाक जब आएगी तब आएगी, फ़िलहाल तो वे फ़िक्स ही रहती हैं। सुना है कुछ लोग फ़ोल्डिंग नाक का सपना देखने में लगे हैं। जब ज़रा ख़तरा दिखा, उसे फ़ोल्ड करके बचा लिया। नाकों के पंख नहीं होते कि वे आसन्न ख़तरा भाँपकर फुर्र से उड़ जाएँ।

मेरी नाक उसी तरह की नाक… वैसी ही है जैसी महारानी विक्टोरिया की रही होगी। जैसी सड़क किनारे माला बेचने वाली फूलमती की है। यह बात अलग है कि उसकी नाक में सुनहरे फूल के आकार की नथ लटकी रहती है। फिर भी वह नाक ही तो है, जिसे वह ग्राहकों द्वारा अधिक मोलभाव करने पर सिकोड़ लेती है। वैसे तो नाक सानिया मिर्ज़ा के पास भी है, जिसमें अटकी चन्द्राकार नोज़रिंग तभी दमकती है, जब मैच जीतने के बाद वह ख़ुशी से लहराती हुई हैंडशेक के लिए पराजिता के क़रीब जाती है। इसी तरह की नाक नेल्सन मंडेला से लेकर वॉरेन हेस्टिंग्स के पास भी रही होगी। नाक तो आख़िरकार नाक ही होती है। नाक लैंगिक विभेद को नहीं मानतीं।

इतिहास में राजपुरुषों या राजरानियों की नाक का कुछ ख़ास हवाला नहीं मिलता। पुराने ग्रन्थों में भी जो नखशिख मिलता है, उसमें भी नाक के मामले पर कम, अन्य दैहिक अवयवों पर बात अधिक हुई है। लेकिन यह तथ्य सर्वज्ञात है कि अनेक भीषण जंग नाक की ख़ातिर लड़ी गयीं। महाभारत से लेकर मोहल्ला स्तर की मारपीट के पीछे प्रत्यक्ष या परोक्ष नाक का मामला पाया ही गया। रणभूमि में योद्धा मर भले गये हों पर उनकी नाक सही सलामत रही। वैसे नाक बड़ी सम्वेदनशील होती है, वह वास्तविक ख़तरे से लेकर अफ़वाह तक की असलियत का पता पा लेती है।

यह बात भी तय है कि मेरे पास समूची नाक है तो यह मान लेने में क्या हर्ज कि रुपहले पर्दे की तमाम ज्ञात, अल्पज्ञात और लगभग अज्ञात कुलशील  तारिकाओं के पास भी यह होगी ही। रही ही होगी।

बॉक्स ऑफिस पर फ़िल्म चल भी जाती हैं तो कभी-कभी फ़्लॉप भी हो जाती हैं। फ़िल्म समीक्षक फ़िल्म देखने के बाद उसकी मिट्टी पलीद कर देते हैं।मेधावी विचारक बिना देखे ही उस पर फैसला सुना देते हैं। निर्माता से लेकर वितरक तक लुटपिट जाते हैं। लेकिन फ़िल्मी सितारे तब भी जगमगाते रहते हैं। उनकी नाक न तो कटती है और न ही बाय डिफ़ॉल्ट कटी हुई मानी जाती है। नामचीन नाकें हर हाल में बची रहती हैं। वैसे भी डाउनमार्केट नाक के होने या न होने से कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता।

बड़े दिनों से सुनते आये हैं कि अमुक जी अपनी नाक पर मक्खी तक को नहीं बैठने देते। पर लगता यही है कि यह एक स्थायी झूठ है। कुछ मुहावरे भी ऐसे होते हैं जो भ्रान्ति से उपजते हैं। अफ़वाहें भी मौका पाकर दंतकथाओं में तब्दील हो जाती हैं। आस्था से लबरेज़ काव्यात्मक बिम्ब जातिगत गौरव का साक्ष्य बन जाते हैं। अवांतर प्रसंगों की दहलीज़ पर गौरवमयी नासिका के अनुत्तरित सवाल आ विराजते हैं।

एक बात तो सब समझ लें कि नाक को गुड़ या गंदगी से सने हाथ से छुओगे तो मक्खियाँ उसकी थाह हर हाल में पा ही लेंगी। शक्करखोर मक्खियाँ बड़ी हठी होती ही हैं। वे मिठाई और गंदगी के लुत्फ़ समभाव से उठाती हैं।

नाक का मूलकर्म सूंघना और श्वसन है। कुछ अतिरिक्त करने के लिए यदि जी मचलता है तो बाक़ायदा अनुलोम विलोम करो। स्वदेशी हवा को भीतर भरने में कृपया कृपणता न बरतें। सिर्फ़ इतना ही नहीं, यह भी करें कि आती-जाती साँस में थिर हो जाएँ।

इतिहास बड़ा बेरहम होता है। उसमें टाँग तभी अड़ाओ, जब अपनी नाक की रक्षा का पक्का इंतजाम कर लो।

अलबत्ते नकटे (या नकटी) कुछ भी कर सकने के लिए आज़ाद हैं।

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निर्मल गुप्त
बंगाल में जन्म ,रहना सहना उत्तर प्रदेश के मेरठ में . व्यंग्य लेखन भी .अब तक कविता की दो किताबें -मैं ज़रा जल्दी में हूँ और वक्त का अजायबघर छप चुकी हैं . दो व्यंग्य लेखों के संकलन इस बहुरुपिया समय में तथा हैंगर में टंगा एंगर प्रकाशित. कुछ कहानियों और कविताओं का अंग्रेजी तथा अन्य भाषाओं में अनुवाद . सम्पर्क : [email protected]

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