‘Nirarthak Prem’, a poem by Ruchi

सतरंगी सपनों की उमर में
किसी ने सफ़ेद घोड़े पर राजकुमार के ख़्वाब बुने
किसी ने बाइक पर बैठे डूड के
किसी ने दूर खड़े निहारते शख़्स को प्रेमी जाना
तो किसी ने झट लब चूम, गले लग जाने वाले को।
मैं न समझ सकी प्रेम व प्रेमी की उचित पात्रता,
और प्रेम स्थगित रहा।

सतरंगी सपनों की उमर से एक पड़ाव आगे
किसी ने बताया प्रेम चिह्नों को ख़ास
किसी ने प्रेम उपहारों को
किसी ने पति की हर सहमति को प्रेम बताया
तो किसी ने प्रताड़नाओं में प्रेम ढूँढ निकाला।
मैं न समझ सकी प्रेमी व पति के प्रेम का फ़र्क़,
और प्रेम बाधित रहा।

सतरंगी सपनों के दौर से कई फलांग आगे
किसी ने बताया माँ-बाप, बुज़ुर्गों, घर-परिवार से ही प्रेम है सार्थक
तो किसी ने ख़ुद को ही सर्वेसर्वा माना
किसी ने प्रकृति में प्रेम दिखाया
तो कोई चाँद-तारों में प्रेम ढूँढ आया।
मैं नहीं चुन पायी प्रेम की सार्थकता,
और प्रेम निरर्थक रहा।

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