ओ मेरे सब अपनो तुमसे
मुझे बग़ावत करनी होगी!

अब तक जी ली गई उमर को
मैंने तीखी धूप खिलायी,
सूरज की सौगंध मुझे है
मैंने भर-भर प्यास पिलायी,
अब तक जो बादल उभरे हैं
डरे-डरे से ही उभरे हैं,
सब मौसम परदेसी बनकर
मेरी गलियों से गुज़रे हैं,
हवा यहाँ इतनी भारी है
साँसें ही ले सकता केवल,
सपनों का जीवन क्या जीना—
सपनों को जनमाना मुश्किल!

ओ मेरे जैसे ही अपनो!
ऐसी सपनों-ख़ोर हवा को
मलयानिल का नाम दिया तो
मुझे अदावत करनी होगी!

ओ मेरे सब अपनो तुमसे
मुझे बग़ावत करनी होगी!

भूले से बरखा तो आती
पर पानी नमकीन बरसता,
भावों का चातक बेचारा
भरमों को पी-पीकर रहता,
मधुमासों से परिचय कैसा
इनकी छाया भी अनजानी,
सरसाँ की फ़सलों को कैसे
कह दूँ होती बहुत सुहानी?
सुना हुआ है, पढ़ा हुआ है
मौसम तो बदला करते हैं,
पर मेरी ड्योढ़ी पर पतझर—
बारह मास रहा करते हैं!

ओ मेरे जैसे ही अपनो!
थकी हुई बेहोश रात को
बासंती सम्मान दिया तो
मुझे अदावत करनी होगी!

ओ मेरे सब अपनो तुमसे
मुझे बग़ावत करनी होगी!

पाले पोसे सब सपनों को
मैंने ज़िंदा गाड़ दिया है,
हिरनी-सी भोली यादों को
तड़पा-तड़पा गार दिया है,
मैं कैसा हूँ, घर कैसा है
इसका मुझको ज्ञान नहीं है,
जैसा भी बन पाया, इस पर
मौसम का अहसान नहीं है,
फिर भी ज़िन्दा हूँ इसलिए कि
जीता हूँ अंगारे खाकर,
बिना रुके चलता जाता हूँ
मैं सूखी मल्हारें गाकर।

ओ मेरे जैसे ही अपनो!
तुमने इस बीमार घड़ी को
जो सावन का नाम दिया तो
मुझे अदावत करनी होगी!

ओ मेरे सब अपनो तुमसे
मुझे बग़ावत करनी होगी!

हरीश भादानी की कविता 'ओ अपाहिज आस्थाओ'

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