मैं फिर आऊँगा
भले ही जन्मान्तर के बाद
तुम्हारे ही पास।

मैं झगड़ा करूँगा
देवताओं से
और नक्षत्रों की बाधाएँ पार करके
सुबह खिड़की पर अकस्मात् आए
दूर देश के पक्षी की तरह
या ग़लत करवट सोने के बाद
बाँह में हुए दर्द की तरह
मैं आऊँगा

सब कुछ राख हो जाने के बाद भी
बची रह गई पवित्र चिंगारी की तरह,
नीम के बौर की कड़वी-मीठी गन्ध की तरह,
किसी बेहद बूढ़े के जीवनव्यापी विषाद या
किसी बच्चे की अकारण हँसी की तरह,
मैं फिर आऊँगा।
भले ही जन्मान्तर के बाद
तुम्हारे ही पास।

अशोक वाजपेयी की कविता 'वहीं नहीं'

Book by Ashok Vajpeyi:

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अशोक वाजपेयी
अशोक वाजपेयी समकालीन हिंदी साहित्य के एक प्रमुख साहित्यकार हैं। सामाजिक जीवन में व्यावसायिक तौर पर वाजपेयी जी भारतीय प्रशासनिक सेवा के एक पूर्वाधिकारी है, परंतु वह एक कवि के रूप में ज़्यादा जाने जाते हैं। उनकी विभिन्न कविताओं के लिए सन् १९९४ में उन्हें भारत सरकार द्वारा साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाज़ा गया। वाजपेयी महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के उपकुलपति भी रह चुके हैं। इन्होंने भोपाल में भारत भवन की स्थापना में भी काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

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