बिब्बी की उपलेनुमा आग

मेरे पड़ोस में
एक बुढ़िया रहती है
वैसे तो उसका नाम रमज़ानो है
लेकिन सब उसे प्यार से
बिब्बी कहकर पुकारते हैं

उसके परिवार के बारे में लोग बताते हैं
पति की असामयिक मृत्यु के बाद
उसका छरहरा जवान लड़का भी
जो बिलकुल मेरा ही हमउम्र था
दंगे की भेंट चढ़ गया था

एक लम्बे अरसे बाद
शहर से वापस गाँव आने पर
बिब्बी को उस ऊबड़-खाबड़
चबूतरे पर न पाकर
जहाँ हम कंचे बजाया करते थे
जो अब राहगीरों के मूतने का
स्थायी ठिकाना बन चुका है
मालूम पड़ा
मुफ़लिसी की मारी, वक़्त की सतायी बिब्बी
अब हाड़-माँस का शरीर लिए
पोपले हो चुके मुँह में
पान की गिलोरी को
किसी काल-विशेष की तरह चूसती
रोज़ाना इधर-उधर से बटोरती है गोबर
जिसको पाथती है
दूर चकरोड़ के किनारे
भरी दोपहरी सरकण्डों के बीच बैठ
ताकि पेट की आग बुझाने को
बेच सके उपलेनुमा आग।

शहर में विकास ज़ोरों-शोरों पर है

शहर में भवनों-इमारतों का निर्माण
और शहर का विकास
ज़ोरों-शोरों पर है

वहाँ काम करती औरत
और उसकी पीठ पर बंधा बच्चा,
औरत का कराहना, बच्चे का रोना-चिल्लाना
ज़ोरों-शोरों पर है

काम से हटकर उस औरत का
रोते-चिल्लाते बच्चे को
अपनी सूखी छाती से दूध पिलाना
बच्चे का सूखी छाती से दूध को चूसना
ज़ोरों-शोरों पर है

रोज़ शाम को थक-हारकर
औरत का अपनी टूटी-फूटी झोंपड़ी में लौटना
कच्चे चूल्हे पर रखी हाण्डी में
उस औरत का चावलों को घोटना
चावलों का घुटना
ज़ोरों-शोरों पर है

शहर में एक माँ और बच्चे का विकास
ज़ोरों-शोरों पर है।

नदी

युगों-युगों से
अम्बर-अम्बर
पर्वत-पर्वत
जंगल-जंगल
अनहद नाद की तरह बजते हुए
अपने-आप में मग्न हो
बस उसे बहते रहना था
क्योंकि बहना :
नदी होना है…

लड़की

पक्षियों के कलरव, गिलहरी की उछल-कूद में
रंग-बिरंगे फूलों, पत्तों की सरसराहट में
एक लड़की गाते-गुनगुनाते
ढूँढती है प्रेम
दूर मुण्डेर पर बैठा मैं
उसे ऐसा करते निहारता
निस्सीम, निस्पन्द मौन
सोचता हूँ
क्या आएगा प्यार उसके भी जीवन में?
जैसे आता है किसलय
द्रुमों पर ‘पतझड़’ के बाद।

तुम मुझे फिर मिलना

अमृता प्रीतम की कविता ‘मैं तुझे फिर मिलूँगी’ को पढ़ने के बाद

तुम मुझे फिर मिलना
तबले की ताल बनकर
वीणा की झंकार बनकर
दुःख में सुख बनकर
बारिश में छाता बनकर

तुम मुझे फिर मिलना
किसी कविता की
अविस्मरणीय पंक्तियाँ बनकर
प्रेम पर आधारित किसी
उपन्यास का विराम बनकर
सुबह-सुबह घास पर तुहिन-कण बनकर
पक्षियों के वृंद का कलरव बनकर

तुम मुझे फिर मिलना
प्यार बनकर, अहसास बनकर
गीत-संगीत बनकर
निद्रा में स्वप्न बनकर

न मिलना सरपट दौड़ती
गाड़ी की गति बनकर

बल्कि मिलना
कछुए की चाल बनकर
और मिलना
मृत्यु के निकट
मेरी अन्तिम इच्छा बनकर।

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आमिर
हंस, स्त्रीकाल, चौपाल, कथादेश, मधुमती, अभिनव इमरोज़, अहा! ज़िंदगी, समकालीन जनमत, पोषम पा, हस्ताक्षर, प्रभात ख़बर (पटना और रांची) आदि पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। उर्दू के प्रगतिशील शा'यर ज़फ़र गोरखपुरी के दोहों और निदा फ़ाज़ली की कुछ चुनिंदा नज़्मों का उर्दू से हिन्दी में अनुवाद। फोटोग्राफी, चित्रकला और सिनेमा में विशेष रूचि। संपर्क : [email protected]