Poems: Gaurav Bharti

जैसे कोई लौटता हो अपनी याद में

शहर से लौटना
अपने गाँव
लौटना नहीं होता
हमेशा के लिए

वह होता है
कुछ-कुछ वैसा ही
जैसे कोई लौटता हो अपनी याद में
संचारी भाव लिए

शहर से लौटने वाला हर इंसान
साथ लाता है अपने, थोड़ा-सा शहर
जो फैलता है गाँव में
संक्रमण की तरह

और फिर लौटते हुए
वह छोड़ जाता है
पगडण्डियों पर अपनी बूट में फँसी सड़क

वह छोड़ जाता है
दूसरी पतंगों को काटने का स्थायी भाव

वह छोड़ जाता है
अपने पीछे एक चमकदार बल्ब
जिसकी मरम्मत नहीं हो पाती
फ़्यूज हो जाने पर…

मैं उपन्यास होना चाहता था

आजकल
सुन रहा हूँ
घड़ी की टिक-टिक
साँसों का उतार-चढ़ाव
नल से टपकती बूँदों की टप-टप
कहीं दूर से आती अस्पष्ट आवाज़ें
हैं तो इंसानी मगर
परेशान करती हैं
वैसे ही जैसे मक्खियों की भिनभिनाहट

अजीब उम्र है
अजीब पड़ाव है
बिस्तर पर लेटे हुए सोचता हूँ
कितना अच्छा होता है सफ़र
और याद करने लगता हूँ
अपनी तमाम छोटी-बड़ी यात्राएँ
और ख़ुद को ख़ुद से टटोलते हुए
इस नतीजे पर पहुँचता हूँ कि
मैं उपन्यास होना चाहता था
लेकिन कहानी बन कर रह गया…

ख़्वाब

यूँ तो हर रोज़
सूरज नींद से जगाने चला आता है
अपनी मीठी किरणों के साथ
चिड़ियों की चहचहाहट लिए
मगर तुम्हारा माथे को चूम कर जगाना
देखा गया
अब तक का
सबसे ख़ूबसूरत ख़्वाब है…

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