गौरव भारती की कविताएँ

Poems: Gaurav Bharti

ये कैसा लौटकर आना है

गलियाँ पहचानतीं तो हैं
मगर बुलातीं नहीं,
आकाश निहारता तो है
मगर बातें नहीं करता,
पगडण्डियाँ महसूसती तो हैं
मगर सहलातीं नहीं,
बयारें छूती तो हैं
मगर थपकियाँ नहीं देती,
धूप आकर ठहरती तो है
मगर सेंककर नहीं जाती

ये कैसी अजनबियत है
ये कैसा लौटकर आना है
कुहासे की धुँध है पसरी दूर तलक और
ख़ुद से मिलने जाना है…

कठफोड़वा

रोज़
हर रोज़
एक अकेला
कठफोड़वा आ जाता है
उस सूखे दरख़्त पर
जो मेरी बालकनी के बाहर
निरंकुश सत्ता की माफ़िक खड़ा है

वह आता है
अपने पंजे को दरख़्त में धँसाता है
लगभग झूलते हुए
दरख़्त पर चोट मारने लगता है
अपनी नुकीली चोंच से
ठक-ठक-ठक-ठक-ठक-ठक
बार-बार
लगातार

थोड़ा सम्भलता है
ताकता है इधर-उधर
ऊपर-नीचे
अपनी नन्ही आँखों से
फिर उदासीन हो
चोट मारने लगता है एक ही जगह
बार-बार
लगातार
मानों उसे
उस दरख़्त का कमज़ोर हिस्सा दिख गया हो
जिस पर लगातार प्रहार कर
वह हासिल कर लेगा
अपनी ज़मीं
अपना आशियाँ
अपना वजूद।

आवाज़ बनायी जाती है

कुछ चीख़ें
महज़ चीख़ रह जाती हैं
आवाज़ नहीं बन पाती
क्योंकि आवाज़ की भी एक राजनीति है

आवाज़ बनायी जाती है
आवाज़ सुनायी जाती है
कान में ठूस-ठूसकर भरी जाती है
सड़क के चौराहों पर लगाकर भोंपू
आवाज़ फैलायी जाती है
आवाज़ उठायी जाती है
क्योंकि किसी को उठाना होता है
क्योंकि किसी को गिराना होता है

कुछ चीख़ें
महज़ चीख़ रह जाती हैं
आवाज़ नहीं बन पातीं…

शोर

ख़तरनाक होता है
सबसे ज़्यादा ख़तरनाक होता है
उदास शहर का शोर
आशंकाओं से भरा
अफ़वाहों से सना
गूँजता हुआ
फैलता हुआ
तोड़ता हुआ
फोड़ता हुआ
डराता हुआ
बुझाता हुआ

जब यह ‘शोर’ मेरी कनपटी को
पीटने लगता है
मैं नींद से ऐसे जागता हूँ
मानों कोई
ख़ुद को एक बोरे में समेटकर
भाग जाना चाहता हो…

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