सुरक्षित बाड़, अप्राप्य बचपन

Poems: Manjula Bist

सुरक्षित बाड़

जब वह घूमती है
अपनी घर की चारदीवारी में
जैसे,
वह संसार की सबसे सुरक्षित बाड़ हो

तब मैं
उस बाड़ की समीप से टोह लेने लगती हूँ
कि अब
इसके अधिक मज़बूत होने की सम्भावना
कितनी और बाक़ी बची हुई है!

अप्राप्य बचपन

किशोरावस्था पर इल्ज़ाम है
जल्दी वयस्क हो जाने का

मैं पूछती हूँ…

कभी ख़ुद से पूछा है
क्या उन्हें पूरा बचपन मिला था कभी!

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