अनुवाद: मनोज पटेल (पढ़ते-पढ़ते से साभार)

(पत्नी पिराए के लिए)

21 सितम्बर 1945

हमारा बच्चा बीमार है।
उसके पिता जेल में हैं।
तुम्हारे थके हाथों में तुम्हारा सर बहुत भारी हो चला है।
हमारी तक़दीर अक्स है दुनिया की तक़दीर की।

इंसान बेहतर दिन लेकर आएगा इंसान तक।
हमारा बच्चा ठीक हो जाएगा।
उसके पिता जेल से बाहर आ जाएँगे।
तुम्हारी सुनहली आँखों की गहराइयाँ मुस्कराएँगी।
हमारी तक़दीर अक्स है दुनिया की तक़दीर की।

22 सितम्बर 1945

मैं एक किताब पढ़ता हूँ—
तुम उसमें हो।
एक गीत सुनता हूँ—
तुम उसमें हो।
अपनी रोटी खाने बैठता हूँ—
तुम मेरे सामने बैठी हो।
मैं काम करता हूँ—
तुम मेरे सामने हो।
तुम जो हमेशा तैयार और इच्छुक रहा करती हो—
हम बात नहीं कर सकते एक-दूसरे से
नहीं सुन सकते एक-दूसरे की आवाज़
तुम मेरी विधवा हो आठ बरस से।

24 सितम्बर 1945

सबसे अच्छे समुद्र को अभी पार किया जाना बाक़ी है।
सबसे अच्छे बच्चे को अभी जन्म लेना है।
हमारे सबसे अच्छे दिनों को अभी जिया जाना है;
और वह सबसे अच्छा शब्द जो मैं तुमसे कहना चाहता हूँ
अभी तक कहा नहीं है मैनें।

25 सितम्बर 1945

नौ बज गए हैं।
चौराहे का घण्टाघर बजा रहा है गजर,
बन्द ही होने वाले होंगे बैरक के दरवाज़े।
क़ैद कुछ ज़्यादा ही लम्बी हो गई इस बार—
आठ साल…
ज़िन्दगी उम्मीद का ही दूसरा नाम है, मेरी जान।
ज़िन्दा रहना भी, तुम्हें प्यार करने की तरह
संजीदा काम है।

26 सितम्बर 1945

उन्होंने हमें पकड़कर बन्दी बना लिया,
मुझे चारदीवारी के भीतर,
और तुम्हें बाहर।
मगर ये तो कुछ भी नहीं।
इससे भी बुरा तो तब होता है
जब लोग—जाने या अनजाने—
अपने भीतर ही जेल लिए फिरते हैं…
ज़्यादातर लोग ऐसी ही हालत में हैं,
ईमानदार, मेहनतकश, भले लोग
जो उतना ही प्यार किए जाने के क़ाबिल हैं,
जितना मैं तुम्हें करता हूँ।

30 सितम्बर 1945

तुम्हें याद करना ख़ूबसूरत है,
और उम्मीद देता है मुझे,
जैसे सबसे ख़ूबसूरत गीत को सुनना
दुनिया की सबसे मधुर आवाज़ में।
मगर सिर्फ़ उम्मीद ही मेरे लिए काफ़ी नहीं।
अब गीत सुनते ही नहीं रहना चाहता मैं—
गाना चाहता हूँ उन्हें।

2 अक्टूबर 1945

हवा बह रही है।

चेरी की एक ही डाली
दुबारा कभी नहीं हिलायी जा सकती
उसी हवा द्वारा।

चिड़िया चहचहा रही हैं पेड़ों पर—
उड़ान भरना चाहते हैं पंख।

दरवाज़ा बन्द है—
वह टूटकर खुल जाना चाहता है।

मैं तुम्हें चाहता हूँ—
ज़िन्दगी तुम्हारे जैसी ही ख़ूबसूरत होनी चाहिए
दोस्ताना और प्यारी…

मुझे पता है कि अभी तक
ख़त्म नहीं हुआ है ग़रीबी का जश्न
मगर वह ख़त्म हो जाएगा…

5 अक्टूबर 1945

हम दोनों जानते हैं, मेरी जान,
उन्होंने सिखाया है हमें—
कैसे रहा जाए भूखा और बर्दाश्त की जाए ठण्ड,
कैसे मरा जाए थकान से चूर होकर
और कैसे बिछड़ा जाए एक-दूजे से।

अभी तक हमें मजबूर नहीं किया गया है
किसी का क़त्ल करने के वास्ते
और ख़ुद क़त्ल होने की नियति से भी बचे हुए हैं हम।

हम दोनों जानते हैं, मेरी जान,
उन्हें सिखा सकते हैं हम—
कैसे लड़ा जाए अपने लोगों के लिए
और कैसे—दिन-ब-दिन थोड़ा और बेहतर
थोड़ा और डूबकर—
किया जाए प्यार…

6 अक्टूबर 1945

बादल गुज़रते हैं ख़बरों से लदे, बोझिल।

अपनी मुट्ठी में भींच लेता हूँ वह चिट्ठी
जो आयी नहीं अभी तक।

तुम्हारी पलकों की नोक पर टँगा है मेरा दिल,
दुआ देता हुआ उस धरती को
जो गुम होती जा रही है बहुत दूर।

मैं ज़ोर से पुकारना चाहता हूँ तुम्हारा नाम—
पिराए,
पिराए!

4 दिसंबर 1945

अपना वही कपड़ा निकालो जिसमें मैनें तुम्हें पहले पहल देखा था,
सबसे सुन्दर नज़र आओ आज,
बसंत ऋतु के पेड़ों की तरह…
अपने जूड़े में वह कारनेशन लगाओ
जो मैनें तुम्हें जेल से भेजा था एक चिट्ठी में,
ऊपर उठाओ अपना चूमने लायक़, चौड़ा गोरा माथा।
आज कोई रंज नहीं, कोई उदासी नहीं—
क़त्तई नहीं!—
आज नाज़िम हिकमत की बीवी को बहुत ख़ूबसूरत दिखना है
जैसे किसी बाग़ी का झण्डा…

लुइस ग्लुक की कविताएँ

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