कविता संग्रह ‘भेड़ियों ने कहा शुभरात्रि’ से

कवि

बिना कुछ कहे
चुपचाप लौट आया
न किसी की तरफ़ कोई पत्थर उछाला
न किसी की आँख के आँसू पोंछे
चाहता तो बोल सकता था
कम से कम
दो शब्द विरोध में
पर वो भय के साथ-साथ
अपनी भाषा भी बचा लाया
हैरान हूँ
कि घर लौटकर
वो इसी बची हुई भाषा से
या कहूँ तो
लगभग मर चुकी भाषा से
कविता लिखेगा।

एक रात

दिसम्बर की एक सर्द रात
अचानक कविता ने
रज़ाई में दुबके कवि को जगाया
और अब तक सम्मान और पुरस्कारों में मिले
शॉल और दुसालों का हिसाब माँग लिया

दिसम्बर की एक सर्द रात
पसीने से तरबतर हो गया कवि।

निर्वस्त्र

अपने चेहरे
उतारकर रख दो
रात की
इस काली चट्टान पर…
कपड़े भी!
अब घुस जाओ
निर्वस्त्र
स्वप्न और अन्धकार से भरे
भाषा के बीहड़ में…
कविता तक पहुँचने का
और कोई रास्ता नहीं
सिवा इसके।

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मणि मोहन
जन्म: 02 मई 1967, सिरोंज, विदिशा (म.प्र.) | शिक्षा: अंग्रेज़ी साहित्य में स्नातकोत्तर और शोध उपाधि | सम्प्रति: शा. स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गंज बासौदा में अध्यापन। प्रकाशन: वर्ष 2003 में कविता संग्रह 'क़स्बे का कवि एवं अन्य कविताएँ', 2012 में रोमेनियन कवि मारिन सोरेसक्यू की कविताओं की अनुवाद पुस्तक 'एक सीढ़ी आकाश के लिए', 2013 में कविता संग्रह 'शायद', 2016 में कविता संग्रह 'दुर्दिनों की बारिश में रंग' तथा तुर्की कवयित्री मुईसेर येनिया की कविताओं की अनुवाद पुस्तक 'अपनी देह और इस संसार के बीच', 2020 में कविता संग्रह 'भेड़ियों ने कहा शुभरात्रि' प्रकाशित। सम्पर्क: [email protected]