प्रेम

‘Prem’, Hindi Kavita by Deepak Jaiswal

पृथ्वी किसी शेषनाग के
फन पर नहीं टिकी
न ही लगाती है परिक्रमा
किसी तारे की
प्रेम ही वह धुरी है
जिसके भीतर साँस ले रही हैं
ब्रह्माण्ड की असंख्य आकाशगंगाएँ
मेरी बछिया और उसकी बूढ़ाती माँ

क्वार्क, इलेक्ट्रान, प्रोटान
सारी धातुएँ
सारे सागर, हवाएँ, पत्तियाँ, पत्थर
बाँसुरी, शंख, वीणाएँ
मंसूर, लामा, धरती, कुकुरमुत्ते
सभी प्रेम में हैं…

एक दिन
हत्यारा समय
छीन लेगा
हम से
ईश्वर
गुड़िया, गुलाब के फूल
शतरंज की रानी
कलेजा, रोशनी, फेफड़े
सबकुछ
पर अंततः हर बार की तरह
हार जाएगा वह
मेरे प्रेम से
अनगिनत हृदयों के प्रेम से

सिर्फ़ प्रेम जीता है
अनंत काल तक
कछुए की पीठ पर बैठकर!

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