आत्मा के भीतर एक जगह थी, जहाँ विद्यमान था प्रेमघृत। समय के आवेग में सम्भलना था सो चाहिए थी आग। ताप कम ना हो इसलिए यात्रा के दीपक में भरता रहा प्रेमघृत। यात्राएँ हुईं समाप्त, दीपशिखा भी पड़ गयी शीतल, सारा घृत बह गया समय में। देह पारदर्शी हुई, लोगों ने बायीं आँख से देखी पीठ की परखनली से निकलती लौ के अन्तिम धुएँ को, कहा, ‘घृत के साथ जीवन हवन हुआ’।

केवल आत्मा को भान था, उस जगह का जहाँ प्रेम का धुआँ अकारण चिपक गया था।

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विशेष चंद्र ‘नमन’
विशेष चंद्र नमन दिल्ली विवि, श्री गुरु तेग बहादुर खालसा कॉलेज से गणित में स्नातक हैं। कॉलेज के दिनों में साहित्यिक रुचि खूब जागी, नया पढ़ने का मौका मिला, कॉलेज लाइब्रेरी ने और कॉलेज के मित्रों ने बखूबी साथ निभाया, और बीते कुछ वर्षों से वह अधिक सक्रीय रहे हैं। अपनी कविताओं के बारे में विशेष कहते हैं कि अब कॉलेज तो खत्म हो रहा है पर कविताएँ बची रह जाएँगी और कविताओं में कुछ कॉलेज भी बचा रह जायेगा। विशेष फिलहाल नई दिल्ली में रहते हैं।