प्रेम का धुआँ

आत्मा के भीतर एक जगह थी, जहाँ विद्यमान था प्रेमघृत। समय के आवेग में सम्भलना था सो चाहिए थी आग। ताप कम ना हो इसलिए यात्रा के दीपक में भरता रहा प्रेमघृत। यात्राएँ हुईं समाप्त, दीपशिखा भी पड़ गयी शीतल, सारा घृत बह गया समय में। देह पारदर्शी हुई, लोगों ने बायीं आँख से देखी पीठ की परखनली से निकलती लौ के अन्तिम धुएँ को, कहा, ‘घृत के साथ जीवन हवन हुआ’।

केवल आत्मा को भान था, उस जगह का जहाँ प्रेम का धुआँ अकारण चिपक गया था।