प्रेम की मिठास

‘Prem Ki Mithaas’, a poem by Saraswati Mishra

याद हैं तुम्हें बाग़ में बिताया वह दिन
जब जान गए थे तुम
कच्चे आँवले से मेरा मोह
और अगले ही पल तुम चढ़ गए थे
पेड़ की सबसे ऊँची डाल पर,
झटककर तोड़ लिए थे कुछ सुनहरे फल,
झोली बनी मेरी फ़्रॉक में डालते वक़्त
तुम्हारी आँखों में उतर आयी थी सुनहरी चमक

आँवले की एक फाँक खाकर
मैंने पिया था पानी
और उछाह से कहा था तुमसे-
“आँवला खा के पानी पियो, शरबत-सा मीठा लगता है”
तुमने धीरे से ले लिया था मेरा जूठा आँवला
और झट रख लिया था मुँह में
तब तुमने कहा था… “सुनो!
आँवला तो यूँ भी मीठा है”

पलटकर देखती हूँ बीते समय की ओर
तब महसूस करती हूँ
वह मिठास फल की नहीं
अव्यक्त भावनाओं की थी

आज भी जब होती हूँ केवल ‘अपने’ साथ
स्मृतियों की टोकरी से निकाल लेती हूँ
वही अधखाया आँवला
और चख लेती हूँ अपनी ही नज़रों से बचकर,
जीभ सहेज लेती है वही स्वाद
एक परछाईं बढ़ा देती है खुली हथेली
जिस पर रख देती हूँ वर्षों से सहेजे
सकुचाये हुए से एहसास।

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