‘Prem Shrinkhla’, a poem by Ruchi

मेरे पहले प्रेमी ने मुझे ख़त देते हुए कहा,
“मैंने यह ख़त अपने ख़ून से लिखा है”,
रूह काँप गयी मेरी,
कोई रुझान न होते हुए भी,
मैं ख़त न फेंक पायी उसका।
उसने प्रेम की ऊष्मा, तीव्रता,
कराना चाहा होगा महसूस मुझे,
और मैं जड़ हो गयी,
यह सोचते हुए कि बस,
कक्षा में खिड़की से घण्टे भर की
ताक-झाँक से कैसे कोई कर सकता है
मुझसे प्रेम।
और मैंने खिड़की की सीट छोड़ दी।

मेरे दूसरे प्रेमी मेरे शिक्षक हुए,
जो मुझे अक्सर अंग्रेज़ी साहित्य,
समझाने को तत्पर, बताते थे,
एक सुन्दर दुनिया की बातें।
क्रयू, शेक्सपियर की कविताओं,
को समझाते हुए ही बताया था
उन्होंने कि एक विधवा महिला
की ज़िन्दगी संवारना चाहते हैं वो।
नतमस्तक थी मैं उनके सद्विचारों को
कि दो सालों में उन्होंने सब दरकिनार कर,
मुझसे अपने प्रेम का इज़हार किया,
मैंने ख़ुद को दोषी पाया उस विधवा महिला का,
और मैंने अंग्रेज़ी साहित्य पढ़ना छोड़ दिया।

मेरा तीसरा प्रेमी भयभीत था,
उसने कभी मेरे सामने स्वीकार न किया, अनुराग अपना।
सतर्कता से वो उतरने की कोशिश में था मेरे मन में।
मुझे उसका सेंस ऑफ ह्यूमर पसन्द था,
मैंने सामना किया समाज की भेदती नज़रों का,
जो एक स्त्री-पुरुष की मैत्री पर प्रश्नचिन्ह लगाती थीं।
मैं उत्साहित थी, आक्रामक थी,
मुझे लगा मैं एक नयी राह बना रही हूँ,
अपने क़स्बे की लड़कियों के लिए,
कि फिर कभी किसी लड़की को,
बस अपना अच्छा दोस्त इसलिए
न छोड़ना पड़े कि वो लड़का है।
कि तभी एक दिन, मैंने उसे देखा
“शी लव्स मी, शी लव्स मी नाॅट” करते हुए,
और टूटी बिखरी हुई गुलाब की पंखुड़ियों के साथ,
मैंने उसका दिल भी बिखेर दिया, दोस्ती समाप्त हुई।

तदोपरान्त मेरे प्रेमियों की शृंखला बढ़ती गयी,
पर मैं कभी न प्रेम कर पायी किसी से,
भावों के अतिरेक में, मुझे नहीं स्वीकार्य रहा कभी प्रेम,
अधीरता को मैंने प्रेम का वो पर्दा जाना,
जिसके वक़्त-बेवक़्त उड़ते ही, प्रेम नंगा था।
मैंने प्रेम दाल-चावल-सा निगलना चाहा,
जिसकी ताक़त मेरी रगों में दौड़े।
मैंने प्रेम को ‘विशेष’ किया,
हर प्राणी को सामर्थ्य भर प्रेम देकर,
भावावेश मैंने निर्जीवों पर लुटाये,
हर किसी को उतना ही प्यार किया,
जितने में वो ज़रूरी ना समझे प्रतिदान
और मैं भावशून्य हुई।

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