प्यार करो
अपने से
मुझसे नहीं
सभी से प्यार करो।
वह जो आँखों से दूर
उपेक्षित पड़ा हुआ,
वह जो मिट्टी की
सौ पर्तों में गड़ा हुआ।
वह जिसकी साँसें
अभी आश्रित जीती हैं,
वे आँखें जो एकदम
सपनों से रीती हैं—
उन सबसे
उन सारे के सारे सबसे
प्यार करो।

क्या जाने
किसकी बाँहों पर कल का सूरज टिक कर जागे
किसकी आँखों में छुपी ज्योति से
अँधियारा युग-युग भागे।
इतने असंख्य में कौन कि
जिसके माथे स्वर्गिक दाय पले,
क्या पता कहाँ, किसके इंगित पर
कोटि चरण पदचाप चले।

इसीलिए उगते हर अंकुर को
सोते औ’ जगते सब सुर को।
छोटे से रज कन को।
अनदेखे, भूले औ’ बिसरे
हर क्षण को प्यार करो।

अपने से, मुझसे नहीं, सभी से प्यार करो।

कीर्ति चौधरी की कविता 'मन करता है'