‘Saakshya’, a poem by Harshita Panchariya

जाते-जाते उसने कहा था,
नरभक्षी जानवर हो सकते हैं
पर मनुष्य कदापि नहीं,

जानवर और मनुष्य में
चार पैर और पूँछ के सिवा
समय के साथ
यदि कोई अन्तर उपजा था
तो वह धर्म का था…
फिर सभ्यता की करवटों ने धर्म को
कितने ही लबादे ओढ़ाए,
पर एक के ऊपर एक लिपटे लबादों में
क्या कभी पहुँच पायी है कोई रोशनी?

धीरे-धीरे अँधेरे की सीलन में
जन्मी बू और रेंगते हुए कीड़े,
वह कीड़े जो आज भी
परजीवी बनकर जीवित हैं
मनुष्य की बुद्धि में,
जो शनै: शनै: समाप्त
कर देंगे मनुष्य की मनुष्यता को।

जाते-जाते मुझे उससे पूछना था
मनुष्यता की हत्या होने पर भी
क्या धर्म का जीवित रहना साक्ष्य है
मनुष्य के नरभक्षी नहीं होने का?

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