Short Poems: Harshita Panchariya

‘जीवन का
सबसे बड़ा भ्रम है
स्वयं को जीवित समझना’

और

‘जीवन का
सबसे बड़ा श्रम है
स्वयं को जीवित रखना’

के अंतर में एक सदी जितनी दूरी है

***

समझने और समझाने में
कोई अंतर रहा तो सिर्फ़
‘आ’ का ही रहा।
इतने कम अंतर में भी
समझाने का ‘आ’
समझने के काम ना ‘आ’ सका।
और तुम कहते हो
इंसान सृष्टि का
सबसे समझदार
प्राणी है।

***

हम अंदर से इतने खोखले हो चुके हैं
कि जिसने जैसा भरा और जैसे भरा
उसे ही अपना देवता और प्रसाद मान बैठे
आँख और कान गिरवी रखने का
तो मुआवज़ा भी नहीं मिलता
और तुम कुशलता की प्रार्थना करते हो
कितने बुद्धू हो ना…

***

मुझे लगा था
तुम्हारा जाना अभिनय मात्र था
मुझे महज़ ये समझाने के लिए कि
‘जाना’ हिन्दी की सबसे ख़ौफ़नाक क्रिया है
लेकिन तुम्हारा जाने के बाद भी
स्मृतियों में ‘बार-बार आना’
हिन्दी का सबसे ख़ौफ़नाक क्रिया विशेषण है

और हाँ! ठहरो…
इन सभी के बीच मैं यह बताना भूल गई कि
प्रेम करना संसार का सबसे सस्ता अभिनय है
जिसने उपजी है मिथ्या कल्पनाएँ
अब मत पूछना
संसार की सबसे कलात्मक क्रिया क्या है!

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