‘Samay Hi Nahi Milta Hai’, Hindi Kavita by Sunita Daga

‘समय ही नहीं मिलता है’
कहते हुए
चुरा लेती हैं स्त्रियाँ
समय से क‌ई-क‌ई पल
आते-जाते सँवारती हैं
माथे पर की उलझी लट
ठीक-ठाक करती हैं बिंदी।

आदतन व्यस्त रहते हैं हाथ
घर के कामों में
और बहता रहता है मन
पानी की तरह
भूत-भविष्य-वर्तमान की लहरों पर

हड़बड़ाहट से भरकर
गुनना चाहती हैं स्वंय से कुछ
तो समझिए तय है पक्का
दरवाज़े की बेल का बजना
कामवाली, पड़ोसन के बच्चे,
दूधवाले से तकरार, धोबी का हिसाब,
अनंत झमेले, उलझनों का अम्बार!

‘समय ही नहीं मिलता है’
बुदबुदाते हुए
ठीक-ठाक करती रहती है सारे घर को
सलीक़े से जमाती हैं कभी
अलमारी में बिखरी चीज़ें
तभी अनायास नज़र पड़ती है
नीचे की तरफ़ तह करके रखी
विवाह की चुनर
सुर्ख़-लाल रंग की साड़ी की
काली-धुँधली पड़ी रेशम

एक बवण्डर-सा उठता है भीतर
फिर से आती हैं भान पर
क‌ई-क‌ई पलों का संचित लिये
तैयार होती हैं स्त्रियाँ
समय से दो हाथ करने के लिए

‘समय ही नहीं मिलता है’
बुदबुदाते हुए।

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