तुझे जब भी कोई दुःख दे
इस दुःख का नाम बेटी रखना
जब मेरे सफ़ेद बाल
तेरे गालों पे आन हँसें, रो लेना
मेरे ख़्वाब के दुःख पे सो लेना
जिन खेतों को अभी उगना है
इन खेतों में
मैं देखती हूँ तेरी अंगिया भी

बस पहली बार डरी बेटी
मैं कितनी बार डरी बेटी
अभी पेड़ों में छुपे तेरे कमान हैं बेटी
मेरा जन्म तो है बेटी
और तेरा जन्म तेरी बेटी

तुझे नहलाने की ख़्वाहिश में
मेरी पोरें ख़ून थूकती हैं…

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सारा शगुफ़्ता
(31 अक्टूबर 1954 - 4 जून 1984)सारा शगुफ़्ता पाकिस्तान की एक बनेज़ीर शायरा थीं। 1980 में जब वह पहली और आख़िरी बार भारत आयी थीं तो दिल्ली के अदबी हल्क़ों में उनकी आमद से काफ़ी हलचल मच गयी थी। वह आम औरतों की तरह की औरत नहीं थीं। दिल्ली के कॉफी हाउस मोहनसिंह प्लेस में मर्दों के बीच बैठकर वह विभिन्न विषयों पर बहस करती थीं। बात-बात पर क़हक़हे लगाती थीं। पर्दे की सख़्त मुख़ालिफ़त करती थीं और नारी स्वतन्त्रता के लिए आवाज़ बुलन्द करती थीं। यही नहीं वह आम शायरात की तरह शायरी भी नहीं करती थीं। ग़ज़लें लिखना और सुनना उन्हें बिल्कुल पसन्द न था। छन्द और लयवाली नज़्मों से भी उन्हें कोई लगाव नहीं था। वह उर्दू की पहली ‘ऐंग्री यंग पोएट्स’ थीं और ऐंगरनैस उनकी कविता की पहली और आख़िरी पहचान कही जा सकती है।

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