स्मृतियों की धूप

‘Smritiyon Ki Dhoop’, a poem by Mridula Singh

ऑटो के पीछे
हिलते हुए पोस्टर की तरह तुम्हारा प्रेम
समय की दहलीज़ पर
डगमगाता-सा है
तुम्हें पता है कि
इससे विलग करती हूँ तुम्हें

कंक्रीट पर चलते जीवन
की जद्दोजहद में
कौंधियाती है तुम्हारी याद
और देखते ही देखते
नरम होते जाते हैं रास्ते
जिस पर चलती चली जाती हूँ
पीछे छूट जाता है गंतव्य
जीती हूँ रास्ते के सुख को

सर्दियों में ठिठुरता शहर
दुबका होता है जब ओढ़े
कोहरे की चादर
तुम्हारा ख़याल
भर देता है मुझमें गरमाई

तुम्हें सोचने भर से
जीवन के अँधेरे में छिटक
जाती है चम्पई धूप
छिन भर के लिए
जैसे रात में
दूर से आती हेडलाइट की
पीली रौशनी छिटक जाती है
धुँधली सड़क पर!

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