स्त्री और प्रेम

‘Stree Aur Prem’, a poem by Chandra Phulaar

प्राणिमात्र को जीवित रहने के लिए
रोटी, कपड़ा और मकान के साथ-साथ
प्रेम भी चाहिए
किन्तु स्त्री को तो मात्र
प्रेम ही चाहिए
स्त्रियाँ प्रेम ही खाना, पहनना, ओढ़ना चाहती हैं।
प्रेम में ही दुबकना चाहती हैं!

उनकी देह में
प्रेम की कमी
प्रायः झाँकती है
आखों के नीचे काले घेरों से
धँसे गालों से
निपट उदास चेहरे से।
स्त्रियाँ अक्सर पोषक आहार की नहीं
प्रेम की कमी से ‘एनिमिक’ हो जाती हैं…!

हे पुरुष!
तुमने स्त्री को समझने के लिये
जाने कितनी किताबें, कितने ग्रंथ
पलट दिए
एक बार उससे ही प्रेम से पूछ लेते
उसकी उदासियों का कारण
वो पूछने भर से अपनी तमाम उदासियों के खोल से
बाहर निकल सकती थी!
तुमसे लिपट रो सकती थी!
…स्त्रियाँ जटिल हो जाती हैं
क्यूंकि तुम सरल नहीं हो पाते!

कितने मूर्ख हो तुम
स्त्री को संतुष्ट करने के लिए तुम
उसकी देह में फिरते रहे
और वह मन के संकीर्ण कोने में
आजीवन तुम्हारी राह देखती रही
…कोई किसी को न पा सका…!

इतिहास गवाह है
स्त्री ने जब भी पुरुष से प्रेम माँगा
पुरुष ने उसे देह परोस दी…
कितनी बड़ी त्रासदी है यह…!

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