‘Stri Purush Sameekaran’, poems by Anuradha Annanya

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जब पिता पिताओं से नहीं होते
छोड़ देते हैं अपनी शासक छवि
और अपनी बेटियों के साथ खड़े होते हैं

उसी तरह जब भाई बहनों से हो जाते हैं
अपनी बहनों की प्रेमकथाओं को अपने भीतर महफ़ूज़ रखते हैं
अपनी बहनों की आज़ादी के लिए लड़ते हैं

ऐसे पति भी हैं जो पत्नियों के स्वामी नहीं हुए
अपनी पत्नियों की सहेलियों से बन जाते हैं

ऐसे पिता, पति और भाई
उनके चेहरे पर स्त्रियों जैसी ही यात्रा दिखायी देती
उन्हें स्त्री ही कहा जाता है
इसका मतलब दो तरह से लिया जाता है
एक गाली और एक गुण की तरह
लेकिन ये दोनों ही तरह से व्यवस्था को चुनौती देते
ऐसे पुरुष हर समय की पैदाइश होते हैं
और अपने पुरुषत्व के साथ ही स्त्री होना बन्द नहीं करते।

2

कभी-कभी माँएँ भी पिताओं की परिभाषा में उतर जाती हैं
अपने स्त्रीत्व के साथ ही, बिना शासक हुए
अपने बच्चों को सुरक्षित कवच देती
सृजन की पूरी ज़िम्मेदारी निभाती हुईं
ठीक अपनी परिभाषा के विपरीत
वो सब काम करती हैं
जो पिताओं के लिए रचे गए हैं

कभी-कभी बहनों का साहस
कमज़ोर भाइयों की ताकत बन जाता है
पशुओं की तरह हाँकी हुई पत्नियाँ
महत्वपूर्ण और अन्तिम निर्णय लेती है
डंके की चोट पर
वैसे ही जैसे अपेक्षित छवि में मर्द लेते हैं

इस तरह स्त्रियों का पुरुषों-सा होना
पुरुषों का स्त्रियों-सा होना
एक प्राकृतिक गुण की तरह
प्रवाहित होता रहता है
और लैंगिक ढाँचों के सारे सूत्र टूटते रहते हैं।

यह भी पढ़ें:

हर्षिता पंचारिया की कविता ‘स्त्री और पुरुष’
श्वेता राय की कविता ‘मेरे पुरुष’
अविनाश कुमार की कविता ‘स्त्री-पुरुष’

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