Tag: दलित विमर्श

Fire, Riots, Curfew

सच यही है

'Sach Yahi Hai', a poem by Mohandas Naimishrai सच यही है मंदिर में आरती गाते हुए भी नज़दीक की मस्जिद तोड़ने की लालसा हमारे भीतर जागती रहती है और मस्जिद में...
Madan Veera

घोड़ा

घोड़े के पास सिर्फ़ 'हाँ' में हिलाने के लिए सिर है नर्म पीठ है और दिशाहीन दौड़ के लिए चार टाँगें हैं वह दौड़ता है सवार के हुक्म पर रुकता...
Arrow, Baan, Archery

आज का एकलव्य

यह कविता यहाँ सुनें: https://youtu.be/xGEsqP19JHE ए महाभारत के द्रोणाचार्य! तुमने आज पुनः गुरु-दक्षिणा का ढोंग रचा है लेकिन मैं हूँ एकलव्य आज का सदियों पुराना नहीं तुम्हारी नस-नस से परिचित...
Jayant Parmar

पड़

अनुवाद: स्वयं लेखक द्वारा  'पड़' - मृत जानवर, जिसे ढेड लोग काँवरी से उठाकर ले आते हैं और उसकी खाल उधेड़ने के बाद खाने के...
Dalpat Chauhan

व्यथा

अनुवाद: मायाप्रकाश पाण्डेय मैं भी हैरान हूँ इस परकीय संस्कृति में जन्म लेकर त्रस्त हृदय मेरे तू और तुम भी चलो प्रिये चलो द्वार-द्वार पर बैठाए मंदिरों को फेंक दें खाई...
Om Prakash Valmiki

यह अंत नहीं

"छेड़-छाड़ी हुई है... बलात्कार तो नहीं हुआ... तुम लोग बात का बतंगड़ बना रहे हो। गाँव में राजनीति फैलाकर शांति भंग करना चाहते हो। मैं अपने इलाके में गुंडागर्दी नहीं होने दूँगा... चलते बनो।"
Om Prakash Valmiki

विध्वंस बनकर खड़ी होगी नफ़रत

तुमने बना लिया जिस नफ़रत को अपना कवच विध्वंस बनकर खड़ी होगी रू-ब-रू एक दिन तब नहीं बचेंगी शेष आले में सहेजकर रखी बासी रोटियाँ पूजाघरों में अगरबत्तियाँ,...
Om Prakash Valmiki

बस्स! बहुत हो चुका

जब भी देखता हूँ मैं झाड़ू या गन्दगी से भरी बाल्टी कनस्तर किसी हाथ में मेरी रगों में दहकने लगते हैं यातनाओं के कई हज़ार वर्ष एक साथ जो फैले हैं...
Dalits - The Untouchables

हीरा डोम की ‘अछूत की शिकायत’ – हिन्दी की पहली दलित कविता

हीरा डोम भारतीय साहित्य में प्रथम दलित कवि के रूप में जाने जाते हैं, जिनकी केवल एक कविता 'अछूत की शिकायत', जो मूलतः भोजपुरी...
Om Prakash Valmiki

खेत उदास हैं

चिड़िया उदास है जंगल के खालीपन पर, बच्चे उदास हैं भव्य अट्टालिकाओं के खिड़की-दरवाज़ों में कील की तरह ठुकी चिड़िया की उदासी पर, खेत उदास हैं भरपूर फ़सल के बाद भी सिर...
Om Prakash Valmiki

जूता

हिकारत भरे शब्द चुभते हैं त्वचा में सुई की नोक की तरह जब वे कहते हैं— साथ चलना है तो क़दम बढ़ाओ जल्दी-जल्दी जबकि मेरे लिए क़दम बढ़ाना पहाड़ पर चढ़ने...
Om Prakash Valmiki

कविता और फ़सल

ठण्डे कमरों में बैठकर पसीने पर लिखना कविता ठीक वैसा ही है जैसे राजधानी में उगाना फ़सल कोरे काग़ज़ों पर। फ़सल हो या कविता पसीने की पहचान हैं दोनों ही। बिना पसीने...

STAY CONNECTED

32,392FansLike
11,518FollowersFollow
21,179FollowersFollow
665SubscribersSubscribe

Recent Posts

Suresh Jinagal

सुरेश जिनागल की कविताएँ: अक्टूबर 2020

ललेश्वरी बर्फ़ का सीना चीरकर उगे चिनार के नीचे बैठकर आग का कोई गीत गाती स्त्री सदियों की बर्फ़ को पिघला रही है उसकी ज़िद, उसका साहस...
Ganesh Shankar Vidyarthi

धर्म की आड़

इस समय, देश में धर्म की धूम है। उत्‍पात किये जाते हैं, तो धर्म और ईमान के नाम पर और ज़िद की जाती है,...
Ibne Insha

सब माया है

सब माया है, सब ढलती-फिरती छाया है इस इश्क़ में हमने जो खोया, जो पाया है जो तुमने कहा है, 'फ़ैज़' ने जो फ़रमाया है सब माया...
Sandeep Nirbhay

चिलम में चिंगारी और चरखे पर सूत

मेरे बच्चो! अपना ख़याल रखना आधुनिकता की कुल्हाड़ी काट न दे तुम्हारी जड़ें जैसे मोबाइलों ने लोक-कथाओं और बातों के पीछे लगने वाले हँकारों को काट दिया है जड़ों सहित वर्तमान...
Kunwar Narayan

अबकी अगर लौटा तो

अबकी अगर लौटा तो बृहत्तर लौटूँगा चेहरे पर लगाए नोकदार मूँछें नहीं कमर में बाँधे लोहे की पूँछें नहीं जगह दूँगा साथ चल रहे लोगों को तरेरकर न देखूँगा...
Poonachi - Perumal Murugan

पेरुमल मुरुगन – ‘पूनाची’

पेरुमल मुरुगन के उपन्यास 'पूनाची' से उद्धरण | Quotes by Perumal Murugan from 'Poonachi'   "मैं इंसानों के बारे में लिखने के प्रति आशंकित रहता हूँ;...
Leeladhar Jagudi

अपने अन्दर से बाहर आ जाओ

हर चीज़ यहाँ किसी न किसी के अन्दर है हर भीतर जैसे बाहर के अन्दर है फैलकर भी सारा का सारा बाहर ब्रह्माण्ड के अन्दर है बाहर सुन्दर...
Dhoomil

पटकथा

जब मैं बाहर आया मेरे हाथों में एक कविता थी और दिमाग़ में आँतों का एक्स-रे। वह काला धब्बा कल तक एक शब्द था; ख़ून के अँधेर में दवा का ट्रेडमार्क बन गया...
Venu Gopal

मेरा वर्तमान

मैं फूल नहीं हो सका। बग़ीचों से घिरे रहने के बावजूद। उनकी हक़ीक़त जान लेने के बाद यह मुमकिन भी नहीं था। यों अनगिन फूल हैं वहाँ। लेकिन मुस्कुराता हुआ...
Kedarnath Agarwal

हमारी ज़िन्दगी

हमारी ज़िन्दगी के दिन, बड़े संघर्ष के दिन हैं। हमेशा काम करते हैं, मगर कम दाम मिलते हैं। प्रतिक्षण हम बुरे शासन, बुरे शोषण से पिसते हैं। अपढ़, अज्ञान, अधिकारों से वंचित...
कॉपी नहीं, शेयर करें! ;-)