Tag: जाति
जनपथ
'Janpath', a poem by Jaiprakash Leelwan
वर्णाश्रम की जाँघ चाटने वाले
सतयुगी शासक अब
राजपथ के इर्द-गिर्द बनी
माँदों में घुस चुके हैं।
पक रही है यहाँ
मृत इतिहास की...
तब तुम्हारी निष्ठा क्या होती?
यदि वेदों में लिखा होता
ब्राह्मण ब्रह्मा के पैर से हुए हैं पैदा।
उन्हें उपनयन का अधिकार नहीं।
तब, तुम्हारी निष्ठा क्या होती?
यदि धर्मसूत्रों में लिखा होता
तुम...
चुनौती
तुमने चुरा लिए
हमारे विकास के रास्ते
शिक्षा पर लगा दिए प्रतिबंध
आखर पर आज रख दी है तुमने
हमारी भागीदारी के लिए
योग्यता की शर्त
पर कब तक फेकोगे...
माँ! मैं भला कि मेरा भाई?
अनुवादः साहिल परमार तथा फूलचंद गुप्ता
तुम्हारी चमर कौं-कौं से मैं तंग आ गई
तुमने तो राग बिना ही नौटंकी कर रखी है
तुम्हारे बाबा क्या गए
तुमने...
घृणा तुम्हें मार सकती है
चाहे संकीर्ण कहो या पूर्वाग्रही
मैं जिस टीस को बरसों-बरस
सहता रहा हूँ
अपनी त्वचा पर
सुई की चुभन जैसे,
उसका स्वाद एक बार चखकर देखो
हिल जाएगा पाँव तले...
तलाश
यह धर्म का कौन सा गुण है जो हमारे किरायदार तक के यहाँ काम करने वालों या खाना बनाने वालों की जाति से भी भंग हो जाता है?
सच यही है
'Sach Yahi Hai', a poem by Mohandas Naimishrai
सच यही है
मंदिर में आरती गाते हुए भी
नज़दीक की
मस्जिद तोड़ने की लालसा
हमारे भीतर जागती रहती है
और मस्जिद में...
घोड़ा
घोड़े के पास
सिर्फ़ 'हाँ' में हिलाने के लिए सिर है
नर्म पीठ है
और दिशाहीन दौड़ के लिए चार टाँगें हैं
वह दौड़ता है सवार के हुक्म पर
रुकता...
आज का एकलव्य
यह कविता यहाँ सुनें:
https://youtu.be/xGEsqP19JHE
ए महाभारत के द्रोणाचार्य!
तुमने आज पुनः गुरु-दक्षिणा का ढोंग रचा है
लेकिन मैं हूँ एकलव्य आज का
सदियों पुराना नहीं
तुम्हारी नस-नस से परिचित...
पड़
अनुवाद: स्वयं लेखक द्वारा
'पड़' - मृत जानवर, जिसे ढेड लोग काँवरी से उठाकर ले आते हैं और उसकी खाल उधेड़ने के बाद खाने के...
व्यथा
अनुवाद: मायाप्रकाश पाण्डेय
मैं भी हैरान हूँ
इस परकीय संस्कृति में जन्म लेकर
त्रस्त हृदय मेरे
तू और तुम भी चलो प्रिये
चलो
द्वार-द्वार पर बैठाए मंदिरों को
फेंक दें खाई...
यह अंत नहीं
"छेड़-छाड़ी हुई है... बलात्कार तो नहीं हुआ... तुम लोग बात का बतंगड़ बना रहे हो। गाँव में राजनीति फैलाकर शांति भंग करना चाहते हो। मैं अपने इलाके में गुंडागर्दी नहीं होने दूँगा... चलते बनो।"









