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मकान
आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है
आज की रात न फ़ुटपाथ पे नींद आएगी
सब उठो, मैं भी उठूँ, तुम भी उठो, तुम भी...
अन्धेरे अकेले घर में
अन्धेरे अकेले घर में
अन्धेरी अकेली रात।
तुम्हीं से लुक-छिपकर
आज न जाने कितने दिन बाद
तुमसे मेरी मुलाक़ात।
और इस अकेले सन्नाटे में
उठती है रह-रहकर
एक टीस-सी अकस्मात्
कि कहने...
मिल-बाँटकर
घर से चलते वक़्त पोटली में
गुड़, सत्तू, चबैना रख दिया था माँ ने
और जाने क्या-क्या,
ठसाठस रेलगाड़ी में देर तक खड़े-खड़े
भूख लगने लगी तो पोटली खोली
जिसके...
आमिर विद्यार्थी की कविताएँ
घर
तमाम धर्म ग्रंथों से पवित्र
ईश्वर और अल्लाह से बड़ा
दैर-ओ-हरम से उम्दा
लुप्त हो चुकी महान सभ्यताओं से आला
दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत शब्द
मैं कहूँगा—घर!
माँ की गोद-सा...
सरकारी नीलामी
'Sarkari Neelami'
poem by Vishal Singh
बाबा ने उनके हिस्से की,
दुनिया पे ताना मेरा घर
घर के ऊपर से जाते थे
रोंदू बादल भी ख़ुश होकर
घर की यारी थी...
मैं फिर फिर लौटूँगा
'Main Phir Phir Lautoonga', a poem by Rahul Boyal
मैं फिर फिर लौटूँगा
मगर तिजोरी जैसे घर
और कोठरी जैसे दफ़्तर को
भूलना चाहूँगा
मैं कहीं और लौटूँगा
मैं उदास...
घर पूछता है
जाने डगर में जाकर
अनजाने राह में भटककर
थोड़ा रुककर
सुस्ताकर
क्या बेझिझक
याद नहीं करते हो अपना घर?
घर
'Ghar', a poem by Rohit Thakur
कहीं भी घर जोड़ लेंगे हम
बस ऊष्णता बची रहे
घर के कोने में
बची रहे धूप
चावल और आटा बचा रहे
ज़रूरत-भर के...






