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Kaifi Azmi

मकान

आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है आज की रात न फ़ुटपाथ पे नींद आएगी सब उठो, मैं भी उठूँ, तुम भी उठो, तुम भी...
Agyeya

अन्धेरे अकेले घर में

अन्धेरे अकेले घर में अन्धेरी अकेली रात। तुम्हीं से लुक-छिपकर आज न जाने कितने दिन बाद तुमसे मेरी मुलाक़ात। और इस अकेले सन्नाटे में उठती है रह-रहकर एक टीस-सी अकस्मात् कि कहने...
Prem Shankar Raghuvanshi

मिल-बाँटकर

घर से चलते वक़्त पोटली में गुड़, सत्तू, चबैना रख दिया था माँ ने और जाने क्या-क्या, ठसाठस रेलगाड़ी में देर तक खड़े-खड़े भूख लगने लगी तो पोटली खोली जिसके...
Fingers, Hands, Love, Couple

आमिर विद्यार्थी की कविताएँ

घर तमाम धर्म ग्रंथों से पवित्र ईश्वर और अल्लाह से बड़ा दैर-ओ-हरम से उम्दा लुप्त हो चुकी महान सभ्यताओं से आला दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत शब्द मैं कहूँगा—घर! माँ की गोद-सा...
Moon

सरकारी नीलामी

'Sarkari Neelami' poem by Vishal Singh बाबा ने उनके हिस्से की, दुनिया पे ताना मेरा घर घर के ऊपर से जाते थे रोंदू बादल भी ख़ुश होकर घर की यारी थी...
Rahul Boyal

मैं फिर फिर लौटूँगा

'Main Phir Phir Lautoonga', a poem by Rahul Boyal मैं फिर फिर लौटूँगा मगर तिजोरी जैसे घर और कोठरी जैसे दफ़्तर को भूलना चाहूँगा मैं कहीं और लौटूँगा मैं उदास...

घर पूछता है

जाने डगर में जाकर अनजाने राह में भटककर थोड़ा रुककर सुस्ताकर क्या बेझिझक याद नहीं करते हो अपना घर?
Rohit Thakur

घर

'Ghar', a poem by Rohit Thakur कहीं भी घर जोड़ लेंगे हम बस ऊष्णता बची रहे घर के कोने में बची रहे धूप चावल और आटा बचा रहे ज़रूरत-भर के...
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