Tag: IGNOU MA Hindi Study Material (MHD)

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Raghuvir Sahay

दुनिया

हिलती हुई मुण्डेरें हैं और चटखे हुए हैं पुल बररे हुए दरवाज़े हैं और धँसते हुए चबूतरे दुनिया एक चुरमुरायी हुई-सी चीज़ हो गयी है दुनिया एक पपड़ियायी...
Jaiprakash Kardam

आज का रैदास

शहर में कालोनी कालोनी में पार्क, पार्क के कोने पर सड़क के किनारे जूती गाँठता है रैदास पास में बैठा है उसका आठ वर्ष का बेटा पूसन फटे-पुराने कपड़ों में लिपटा उसके...
Baba Nagarjuna

बादल को घिरते देखा है

अमल धवल गिरि के शिखरों पर, बादल को घिरते देखा है। छोटे-छोटे मोती जैसे उसके शीतल तुहिन कणों को, मानसरोवर के उन स्वर्णिम कमलों पर गिरते देखा है, बादल को...
Malkhan Singh

सुनो ब्राह्मण

'Suno Brahman', Hindi Kavita by Malkhan Singh (1) हमारी दासता का सफर तुम्हारे जन्म से शुरू होता है और इसका अन्त भी तुम्हारे अन्त के साथ होगा। (2) सुनो ब्राह्मण हमारे पसीने...
Abstract Painting of a woman, person from Sushila Takbhore book cover

विद्रोहिणी

माँ बाप ने पैदा किया था गूँगा! परिवेश ने लंगड़ा बना दिया चलती रही निश्चित परिपाटी पर बैसाखियों के सहारे कितने पड़ाव आए! आज जीवन के चढ़ाव पर बैसाखियाँ चरमराती हैं अधिक बोध...
Swayam Prakash

पार्टीशन

"आप क्या खाक हिस्ट्री पढ़ाते हैं? कह रहे हैं पार्टीशन हुआ था! हुआ था नहीं, हो रहा है, जारी है..."
Dalits - The Untouchables

अभिलाषा

'Abhilasha', a poem by N R Sagar हाँ-हाँ मैं नकारता हूँ ईश्वर के अस्तित्व को संसार के मूल में उसके कृतित्व को विकास-प्रक्रिया में उसके स्वत्व को प्रकृति के...
Dhoomil

नक्सलबाड़ी

'सहमति... नहीं, यह समकालीन शब्द नहीं है इसे बालिग़ों के बीच चालू मत करो' —जंगल से जिरह करने के बाद उसके साथियों ने उसे समझाया कि भूख का इलाज नींद...
Rajkamal Chaudhary

ड्राइंगरूम

"जूड़ा बांधने की क्रिया के वक्त मेरी आंखें उसकी बांहों से चिपकी रहीं, और मैं आतंकित होता रहा। आतंकित इसलिए होता रहा कि उसका शरीर अपने-आप में शारीरिक आभिजात्य का सुंदरतम उदाहरण था और पता नहीं मेरा स्वभाव ऐसा क्यों है कि मैं नारी शरीर से और आभिजात्य से यों ही आतंकित होता रहा हूँ।"
Janpath

जनपथ

'Janpath', a poem by Jaiprakash Leelwan वर्णाश्रम की जाँघ चाटने वाले सतयुगी शासक अब राजपथ के इर्द-गिर्द बनी माँदों में घुस चुके हैं। पक रही है यहाँ मृत इतिहास की...
Muktibodh

पता नहीं

1 पता नहीं कब, कौन, कहाँ किस ओर मिले, किस साँझ मिले, किस सुबह मिले!! यह राह ज़िन्दगी की जिससे जिस जगह मिले है ठीक वहीं, बस वहीं अहाते मेंहदी...
Kanwal Bharti

तब तुम्हारी निष्ठा क्या होती?

यदि वेदों में लिखा होता ब्राह्मण ब्रह्मा के पैर से हुए हैं पैदा। उन्हें उपनयन का अधिकार नहीं। तब, तुम्हारी निष्ठा क्या होती? यदि धर्मसूत्रों में लिखा होता तुम...
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