Tag: Metered Verses
उलझन की कहानी
एक अकहरा, दूसरा दोहरा, तीसरा है सो तिहरा है
एक अकहरे पर पल-पल को ध्यान का ख़ूनीं पहरा है
दूसरे दोहरे के रस्ते में तीसरा खेल...
आराम करो
'Aaram Karo', a poem by Gopal Prasad Vyas
एक मित्र मिले, बोले, "लाला, तुम किस चक्की का खाते हो?
इस डेढ़ छटांक के राशन में भी...
इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताजमहल
इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताजमहल
सारी दुनिया को मोहब्बत की निशानी दी है
इसके साए में सदा प्यार के चर्चे होंगे
ख़त्म जो हो न...
चारुचंद्र की चंचल किरणें
चारु चंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में,
स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बरतल में।
पुलक प्रकट करती है धरती, हरित...
यह दिल खोल तुम्हारा हँसना
'Yah Dil Khol Tumhara Hansna', a poem by Gopal Singh Nepali
प्रिये तुम्हारी इन आँखों में मेरा जीवन बोल रहा है
बोले मधुप फूल की बोली,...
चूरन का लटका
"चूरन खाएँ एडिटर जात, जिनके पेट पचै नहीं बात।
चूरन साहेब लोग जो खाता, सारा हिंद हजम कर जाता।
चूरन पुलिसवाले खाते, सब कानून हजम कर जाते।"
भारतेंदु हरिश्चंद्र का रचनाकाल 1857 की क्रांति के बाद का रहा, जब अंग्रेज़ी शासन के खिलाफ कुछ भी कहना लोगों को महंगा पड़ जाता था.. ऐसे में भारतेंदु ने फिर भी हास्य व्यंग्य का सहारा लेकर अंग्रेज़ी शासन की खूब आलोचना की.. यह आलोचना ही आगे चलकर राष्ट्रीय चेतना के लेखन का आधार बनी..
पढ़िए यह कविता भारतेंदु के नाटक 'अंधेर नगरी चौपट राजा' से!
ये दाढ़ियाँ, ये तिलक-धारियाँ नहीं चलतीं
ये दाढ़ियाँ, ये तिलक धारियाँ नहीं चलतीं
हमारे अहद में मक्कारियाँ नहीं चलतीं
क़बीले वालों के दिल जोड़िए मेरे सरदार
सरों को काट के सरदारियाँ नहीं चलतीं
बुरा...
मैंने आहुति बनकर देखा
मैं कब कहता हूँ जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने,
मैं कब कहता हूँ जीवन-मरू नन्दन-कानन का फूल बने?
काँटा कठोर है, तीखा है, उसमें...
तराना-ए-बिस्मिल
'Tarana-E-Bismil' by Ram Prasad Bismil
बला से हमको लटकाए अगर सरकार फाँसी से,
लटकते आए अक्सर पैकरे-ईसार फाँसी से।
लबे-दम भी न खोली ज़ालिमों ने हथकड़ी मेरी,
तमन्ना थी कि...








