ख़्वाब ज़्यादा हों तो नींद कम होने लगती है और ख़्वाबों के बोझ का दबाव आँख के नीचे गहरा रंग छोड़ता जाता है। आईना देखते हुए वो मन ही मन कहती है – ‘मैं बूढ़ी होती जा रही हूँ’। ‘बूढ़े प्रेमी जोड़े कितने ख़ूबसूरत लगते हैं’, वो जबाब में कहा करता था।

‘उस उम्र तक हम साथ नही होंगे’ वो चिढ़ाने के लिए कह दिया करती। वो चिढ़ने का नाटक करता और फिर वो मनाने का… प्रेम में नाटक सुखद होता है और प्रेम का नाटक दुःखद।

वो दीवार से टिककर बैठ गयी और हाथ में लिए चाय सुड़कने लगी। सामने स्मृति की दीवार पर एक ख़ाली फ़ोटो फ़्रेम टँगा है जो खिड़की की हवा से धीरे-धीरे हिल रहा है।

प्रेम की दीवार पर चढ़ा रंग कभी नहीं सूखता, वहाँ पीठ टिकाये बैठा मन जब दीवार से दूर हटता है तो रंग की छाप मन की पीठ पर चिपकी रहती है सदियों तक। उसे जितना मिटाने की कोशिश की जाए वो नहीं छूटती। उस पर नया रंग चढ़ाने भर की कोशिश पुराने रंग को छुपा ज़रूर सकती है पर मिटा नहीं सकती। कभी-कभी किसी बारिश में नये चढ़े रंग के थोड़ा मलिन होते ही पुराना छुपा रंग बाहर झाँकने लगता है।

पहले घूँट से आख़िरी घूँट तक की यात्रा के बीच वो कितना भटकने लगती है। अदरक कूँचते वक़्त और चाय में चम्मच से चीनी डालते वक़्त, उसने सोचा कि आज भरपूर स्वाद लेगी, पर आज फिर से वो चूक गयी। वो फिर से चाय की चुस्कियों में ग़ैरमौजूद रही। वो ऐसी तो ना थी…

स्मृतियों में टहलने से बेहतर है कि वो पार्क में टहला करे, ख़ालीपन के बियाबां से निकलकर भीड़ में खो जाए। वो हर रोज़ समझाती है ख़ुद को… दिल्ली की सड़कों पर ‘कार्य प्रगति पर है, धीरे चलें’ जैसे साइनबोर्ड उसकी रफ़्तार को कम नहीं कर रहे, वो कहीं पहुँचने की जल्दी में नहीं, कहीं से भागने की जल्दी में है।

सिगरेट की आग कब फ़िल्टर तक पहुँचकर उसके होंठ जलाने लगती है उसे ख़बर नहीं होती। होंठ की सूखी दरारों में सिगरेट का धुँआ चिपका है। वो इन दिनों कविताएँ पढ़ के रिकॉर्ड करती है, और सुनती है… उँगलियाँ बार-बार फॉरवार्ड पर क्लिक होती है, बैक हो जाती है और रिकॉर्ड की गयी कविता डिलीट कर देती है। मैसेंजर पर कोई नॉटिफ़िकेशन कब से इंतज़ार कर रहा है। वो अपने इस सख़्त होते जा रहे मन से ख़ुद चिढ़ रही है।

‘वो हँसने से पहले ख़ूब रोना चाहती है’ डायरी में यह लिखकर सो गयी… Kelly Clarkson का यह गीत धीमी आवाज़ में धीरे-धीरे कमरे के हर कोने में फैलने लगता है-

I’d never lived before your love, I’d never felt before your touch, and I never needed anyone to make me feel alive, but then again, I wasn’t really living..

टेबल लैम्प की पीली रोशनी में उसकी आँखों का कोर चमक रहा है…

***

…प्रेम और ज़िम्मेदारी दोनों में अंतर है। एक रूई के फाहे की तरह हल्का है, दूसरा लोहे की तरह वज़नदार। रूई तकिये में भरकर उस पर गहरी नींद ली जा सकती है, उसको हवा में उड़ाकर पीछे दौड़ा जा सकता है, कोई गीत गुनगुनाया जा सकता है… लोहा बोझ ही पैदा कर सकता है। उसमें ज़ंग लग जाएगा, वो चुभ सकता है। विज्ञान दोनों को जगह घेरने वाले पदार्थ की श्रेणी में रखता है, पर कुछ चीज़ें विज्ञान सम्मत नहीं होती… जैसे कि प्रेम!

रात के अँधेरे में रूई की ढेर लोहे की तरह, और लोहा रूई के ढेर की तरह लग सकता है। स्थूलता को छूकर ही जाना जा सकता है, उसे टटोलना ज़रूरी है!

…प्रेम को टटोलना, जिसे हम प्रेम समझ रहे वो अनजाने अँधेरे में ज़िम्मेदारी तो नहीं है? ज़िम्मेदारी थकावट पैदा करती है, और प्रेम उड़ने को आकाश देता है।

बीतते दिसम्बर में चाय की चुस्कियों के साथ कनॉट प्लेस पर बैठा वो बोलता जा रहा था। लड़की उसे तल्लीनता के साथ सुन रही थी। सरकार पर झल्लाहट से शुरू हुई बातें कविताओं के पुल के सहारे कब समय की नदी पार कर देतीं, उन्हें पता ही नहीं चलता था। वे अक्सर क्रांति के गीत गाते-गाते, प्रेम के विषय पर सुस्ताते थे।

चाय के कपों के ढेर के साथ-साथ उनके आसपास बातों का बहुत सारा सुख जमा हो जाता था।

दिसम्बर की ठण्ड में अपने-अपने गर्म कोट में प्रेम, क्रांति, कविता, दर्शन की ऊष्मा बटोर निकल जाते पी वी आर सिनेमा रोड से दिल्ली मेट्रो गेट नम्बर दो की ओर।

“कल मण्डी हॉउस में मंटो की काली सलवार का प्ले है चलोगे?”

लड़का मुस्करा देता है…

“प्रेम में अक्सर शब्द मायने नहीं रखते…” वो कहा करता था।

***

टेबल लैम्प की हल्की पीली रोशनी में तुम नेरूदा की प्रेमिका माल्टीदा की तरह लग रही हो। थकान की नर्म चादर ओढ़े और अपनी हथेलियों को नर्म तकिया बनाकर उकड़ू सी सोयी हुई हो। तुम ऐसे दिख रही हो जैसे किसी ने वर्णमाला का ‘र’ अक्षर उठाकर बिस्तर पर रख दिया हो।

मैं सामने काठ की कुर्सी पर बैठा हूँ। हाथ में रखी किताब में नेरूदा की कविता बुकमार्क कर रखी है।

मैं कविता की पंक्ति- “Through nights like this one I held her in my arms, I kissed her again and again under the endless sky” को पेंसिल से अण्डरलाइन कर रहा हूँ।

तुम्हारी तरफ़ देखा और आगे की पंक्ति पढ़ने लगा और अचानक ठिठक गया। मैं बार-बार इस पंक्ति को दोहराने लगा- “She loved me sometimes, and I loved her too.”

उसी वक़्त मैंने भागकर तुम्हें गले लगा लेना चाहा।

ओह्ह मैं कोई स्वप्न देख रहा था…

कमरे का तापमान घटता जा रहा है। मैं कुर्सी पर बैठ गया। सोचा तुम्हें कुछ लिखूँ! कोई ख़त

प्रिये

आज तुम्हारी याद आयी। इससे आगे क्या लिखूँ, यह सोचते हुए आगे लिखने से पहले कई बार रुका हूँ। लिखने और मिटाने के बीच कई साल के क़िस्से हैं। उन क़िस्सों को याद करना या भूलना अब भले ही महत्त्व नहीं रखता, लेकिन वो है इस सच से बचना भी क्यों?

हम कई बार किसी से मिलते हैं, बिछड़ते हैं, याद करते हैं, उसे याद रखते हैं, भूलने की कोशिश करते हैं और अन्ततः भूल जाते हैं। यह सबके जीवन में घटता है, पर कुछ मन होते हैं कि जिनपर कुछ चित्र लम्बे समय तक छपे रहते हैं। हमेशा के लिए मिटना जैसे असम्भव हो जाता हो, चाहे उसे मिटाने के कितने भी प्रयत्न क्यों ना किए जा रहे हों। कितनी अच्छी बात है ना कि ये कोशिश न तुम कर रही, न मैं…

मैं लिखने में कई बार भटकता हूँ, यह मेरी बुरी आदत है… ख़ैर कैसी हो?

अच्छी ही होंगी! मुझे ख़त लिखने में दिलचस्पी है यह जानते हुए कि तुम्हें ख़त पढ़ने में क़तई रुचि नहीं है (मैं यहाँ ग़लत होना चाहूँगा)।

व्यस्तता होगी तुम्हारे जीवन में, और मैं पूरा ख़ाली। कभी-कभी जीवन और मन दोनों एक जैसे हो जाते हैं। अन्दर बाहर सब ख़ाली।

अक्सर लोग कहते हैं मेरे लिखे में ‘तुम्हारे होने की ऊष्मा’ हमेशा रहती है। उस वक़्त मैं उनसे कहना चाहता हूँ- “इसलिए कि मेरे होने में तुम्हारा होना बचा रह गया है।”

मेरा बार-बार तुम तक लौटना, तुम्हारे दिए हुए स्पर्श को धन्यवाद कहना है। तुम तक लौट पाने के रास्ते जब बन्द हो जाते हैं तो मेरा शब्दों में लौटना होता है।
कभी-कभी, क्यों लिख रहा हूँ इसका कोई मतलब समझ नहीं आता। जैसे सबकुछ बेवजह हो। शायद इसका बेवजह होना ही सुखद है।

लिखते-लिखते ‘बेवजह’ शब्द पर अटक गया मैं, लिखे को वहीं छोड़ खिड़की के पास आ गया। इस वक़्त सिगरेट सुलगाते हुए चाँद को देख रहा हूँ। जैसे किसी ने आसमाँ में लालटेन टाँग दिया हो।

हल्की आवाज़ सुन मैं मुड़ा, लगा शायद बिस्तर पर तुम करवट बदल रही हो।

“क्या नींद नहीं आ रही?” …धीरे से मैंने पूछना चाहा था।

***

भुला दिया जाऊँगा मैं, उन सब के द्वारा जिनसे मैं कभी कहीं मिला होऊँगा, भूल जाएँगे सब मेरी हथेलियों के स्पर्श जिसने गर्मजोशी से कभी पकड़ा होगा किसी का हाथ, भूल जाएँगे मेरा चेहरा, मेरे ही यार, दोस्त।

मैं कहाँ होऊँगा के सवाल के जवाब में पाता हूँ-

किसी फ़ुटनोट की तरह पड़ा रहूँगा मैं मेरी कविताओं में। कभी-कभी कोई कविता पढ़ने के बाद पढ़ लेगा नीचे लिखा मेरा नाम धीमे से। सुनने वाला सुन पाएगा सिर्फ़ और सिर्फ़ कविताएँ, इतना धैर्य नहीं किसी के पास सुन पाए किसी कवि का नाम। उसे कविता सुनने के अलावा होते है हज़ारों काम। किसी प्रेमी द्वारा सुनायी जाएगी मेरी प्रेम कविता प्रेमिका को फ़ोन पर। किसी अनजान महफ़िल में रह जाएगी सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरी कविता।

फिर क्यों लिखता हूँ के जवाब में कहूँगा सबसे- इसी सुकून में लिखता हूँ कविता कि कोई कभी उत्सुक हुआ भी मुझे जानने के लिए तो मैं मिल सकूँ उससे अपनी कविताओं में। कहूँगा अपनी कहानियाँ अपनी कविताओं में। इससे ज़्यादा मेरा सामर्थ्य नहीं। विदा के वक़्त ख़ाली हाथ नही भेजूँगा उसे। रख दूँगा ‘विदा की कविता’ उसके हाथ में…

उसे निराश नहीं करूँगा कि वो इस कविता के कवि से कभी नहीं मिला।

मैं घुल जाऊँगा अपनी कविता में, जैसे हवा घुला होती है पानी में…

अपनी कविताओं में मिलने का वादा रहा…

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