‘Ummeed’, a poem by Akhileshwar Pandey

रेत नदी की सहचर है

जो पत्ते चट्टानों पर गिरकर सूख रहे होते हैं
उन्हें अकेलेपन का नहीं,
हरेपन से बिछुड़ने का दुःख सता रहा होता है

नदी पुल की तरफ़ नहीं
नाव की तरफ़ देख रही होती है

प्रेम करने वाले जानते हैं
जहाँ से कोई नहीं आता
वहाँ से उम्मीद की आहट आती है
क्योंकि
आवाज़ कभी अकेली नहीं होती।

टेसू का टहटहा लालपन
जंगल की सालाना उम्मीद ही तो है
उसकी आवाज़ ख़ामोश बह रही नदी को छूकर महसूस की जा सकती है…।

यह भी पढ़ें: ‘प्रेमियों को नहीं करना होगा वसन्त का इन्तज़ार’

Book by Akhileshwar Pandey:

अखिलेश्वर पांडेय
पत्रकारिता | जमशेदपुर (झारखंड) में निवास | पुस्तक : पानी उदास है (कविता संग्रह) - 2017 प्रकाशन: हंस, नया ज्ञानोदय, वागर्थ, पाखी, कथादेश, परिकथा, कादंबिनी, साक्षात्कार, इंद्रप्रस्थ भारती, हरिगंधा, गांव के लोग, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, प्रभात खबर आदि अनेक पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं, पुस्तक समीक्षा, साक्षात्कार व आलेख प्रकाशित. कविता कोश, हिन्दी समय, शब्दांकन, स्त्रीकाल, हमरंग, बिजूका, लल्लनटॉप, बदलाव आदि वेबसाइट व ब्लॉग पर भी कविताएं व आलेख मौजूद. प्रसारण: आकाशवाणी जमशेदपुर, पटना और भोपाल से कविताएं व रेडियो वार्ता प्रसारित. फेलोशिप/पुरस्कार: कोल्हान (झारखंड) में तेजी से विलुप्त होती आदिम जनजाति सबर पर शोधपूर्ण लेखन के लिए एनएफआई का फेलोशिप और नेशनल मीडिया अवार्ड. ई-मेल : apandey833@gmail.com