अंजाम

‘Anjaam’, a poem by Sonika Trivedi

ये तो तय है कि तुम्हें चुना जाएगा दीवारों में
क्योंकि सदियों से यही हुआ है
तुम्हारे फैलते परों से नहीं ऐतराज़ किसी को
लेकिन तुम्हारे आसमान की परिधि का विस्तार तय है,
तुम्हें स्वतंत्रता तो दी गयी है हमेशा
पर स्वतन्त्रता के मायने पूर्वपरिभाषित हैं,
ग़ौर करो तुम अपने चारों तरफ़
तुम्हें देखने को मिलेंगी कई सतहें
मोटी-मोटी दीवारें,
कुछ परम्पराओं के नाम पर तुम्हारी देहरी बनी हुई है
जिसे पार करना तुम्हारे व्यक्तित्व के ख़िलाफ़ है,
कुछ संस्कारों की दीवारें हैं
जिन्हें तोड़ पाना तुम्हारे लिए मुमकिन नहीं,
कुछ तुम्हारे आसपास खड़ी सामाजिक सोच है
जिसको तुम बदल नहीं सकती,
और इस तरह तुम चुनी जा चुकी हो दीवारों में
जहाँ साँस लेना भी मुश्किल है तुम्हारा पर
तुम दीवारें गिरा नहीं सकतीं
लेकिन तुम खिड़कियों को बना सकती थी
इन सभी दीवारों पर,
कुछ ही सही पर उन दीवारों पर बनी खिड़कियाँ
मायने बदल देती तुम्हारी ज़िन्दगी के
उन सही पाबन्दियों के जो तुम पर थीं,
पर रस्सी से बंधे हाथी की तरह
तुम ख़ुद को बेबस मान कर शांत बैठी रहीं
कोई कोशिश नहीं की झरोखा बनाने की
ख़ुद के लिए लड़ने की क्योंकि
तुम ख़ुद भी तय कर चुकी हो अपना अंजाम
वही सदियों पुराना,
दीवारों में चुने जाना…

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