स्त्रियों को बताया गया—
“नर और मादा एक ही गाड़ी के दो पहिए हैं”
उन्होंने पूछा कि अगल-बग़ल के
या आगे-पीछे के
और उन्हें जवाब मिला कि विन्यास बदलता रहता है

ढुलमुल जवाब देकर टाला गया उन्हें
हर बार यह पूछने पर
कि उनकी जगह कहाँ है
उनकी जड़ें किस ज़मीन या दलदल में हैं

यदि खरी उतर पायीं वे
पुराने ज़माने में
गृह-कार्य में दक्षता जैसी कसौटी पर
और नये ज़माने में
एक अदद डिग्री, एप्रेन की तरह लपेट रसोई बनाने पर
और हर दौर में रंग, रूप की शाश्वत अपेक्षा पर
तब उन्हें ‘ईश्वर की सबसे सुन्दर कृति’ कह नवाज़ा गया

ईश्वर की सबसे सुंदर कृति के हिस्से में आया
उसकी विराट दुनिया का बस एक कोना
भले वह ग़रीब की झोपड़ी हो
या किसी राजा का अंतःपुर

संतान को जीवन देने पर उन्हें कह दिया गया
स्वयं ईश्वर ही
और उन्हें नसीहत दी गयी
कि कदाचित् वे जन्म न दे डालें
अपनी जैसी दूसरी ईश्वर को

इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक के मुहाने पर खड़े
भारतवर्ष के समाज का एक हिस्सा
बनाता रहा मज़ाक़ अनुवांशिकी के नियमों का
जिनके अनुसार
पुरुष के गुणसूत्र से तय होता है
संतान का लिंग,
गर्भाधान से पहले, गर्भधारण के पश्चात
कोशिशें होती रहीं
कि जड़ी-बूटी, टोने-टोटके से शिशु ‘वारिस’ ही हो
वही एक्स-वाई क्रोमोसोम का समुच्चय
वारिस की परिभाषा समाज की संकीर्ण ही रही

कोशिशें गर्भस्थ शिशु का रंग उजला करने की भी हुईं
भर गर्मी में भी खोपरे का गर्म तासीर वाला बीज
या ऐसा ही कुछ और
प्रसूता को खिलाकर, चारदिवारी के परिदृश्य में
वे गृहणी होने की उपादेयता सिद्ध करने का प्रयास करती रहीं
और होती रहीं असफल

सबसे निचले आर्थिक स्तर पर
वे मज़दूरी पर गयीं
तो ठेकेदार ने क़ानून की धज्जियाँ उड़ा
उनकी मज़दूरी में से पुरुषों की तुलना में
ज़्यादा चुंगी काटी

सबसे ऊँचे मंचोंं पर भी
वे थोड़ा ही आगे बढ़ पायीं हाशिए से
यदि उन्हें मिल भी पायी
किसी पृष्ठ की पंक्तियों पर
बीच की जगह
तो नीचे वाली पंक्तियों में

हॉलीवुड तक में
उन्हें कम मिला पारिश्रमिक
और बॉलीवुड में तो कहा गया—
“पैसे लो कम और चमको पुरुषों से अधिक
यहाँ तुम सुंदर दिखने और नाचने-भर के लिए हो”

ग्रास, हार्ड और क्ले
टेनिस के हर कोर्ट पर
उन्होंने पसीने की बाल्टियाँ भर दीं
तीन पुरुष टेनिस खिलाड़ी
अधिकतम ग्रैंड स्लैम जीतने की दौड़ में थे
‘ग्रेटेस्ट ऑफ़ आल टाइम (GOAT)’ के काल्पनिक तमगे की चाह में
तमाम पुरुषों से अधिक ग्रैंड स्लैम जीतकर भी
कम रही महिला खिलाड़ियोंं की इनामी राशि
और कभी नहीं माना गया उन्हें ‘GOAT’ का दावेदार

उन्होंने सोचा
कि पहिए के बदलते क्रम के साथ
बदलता होगा समय भी
क्योंकि उन्हें यक़ीन नहीं रह गया था
कर्म के अनुकूल प्रारब्ध पर,
उन्होंने मानी एक सम्भावना
कि महत्त्व तय करने को
उछाला जाता होगा कोई सिक्का
जिसे गिरना चाहिए
गणित के प्रायिकता के सिद्धांत से
पचास फ़ीसदी मौक़ों पर
उनके भी पक्ष में, किंतु
नियति का कृत्रिम इतिहास
यहाँ भी मुस्तैद खड़ा था—
दुनिया के हर कोने की टकसालों ने
सिक्के की दोनों ओर
पुरुष को ही गढ़ा था!

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देवेश पथ सारिया
बतौर रचनाकार मैं मुख्य रूप से हिन्दी कवि हूं। अनुवाद कार्य एवं कथेतर-गद्य लेखन में भी कुछ रुचि रखता हूँ। साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशन: हंस, वागर्थ, कथादेश, कथाक्रम, परिकथा, पाखी, आजकल, अकार, बया, बनास जन, मधुमती, कादंबिनी, समयांतर, समावर्तन, जनपथ, नया पथ, आधारशिला, दोआबा, बहुमत, परिंदे, ककसाड़, प्रगतिशील वसुधा, अक्षर पर्व, मंतव्य, मुक्तांचल, रेतपथ, कृति ओर, शुक्रवार साहित्यिक वार्षिकी, उम्मीद, कला समय, पुष्पगंधा आदि पत्रिकाओं में मेरी रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं। समाचार पत्रों में प्रकाशन: राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, दि सन्डे पोस्ट। वेब प्रकाशन: सदानीरा, जानकीपुल, अनुनाद, बिजूका, समकालीन जनमत, पोषम पा, हिन्दीनेस्ट, शब्दांकन, कारवां, अथाई, हिन्दीनामा, लिटरेचर पॉइंट। सम्प्रति: ताइवान में खगोल शास्त्र में पोस्ट डाक्टरल शोधार्थी। मूल रूप से राजस्थान के राजगढ़ (अलवर) से सम्बन्ध। ई-मेल: [email protected]