पेड़, नदी, पहाड़ और झरने
प्रेमिकाएँ उन सबसे लेती हैं उधार
एक-एक कटोरी प्रीत
और करघे की खच-खच में बहाती हुई
अपनी निर्झरिणी
वे बुन डालती हैं एक ख़ूबसूरत कालीन
जिसमें मौजूद गाँव खिलखिलाता है
उसकी हँसी के साथ

अपने दुरभाग की पज़ल को
सही खानों में फिट कर
वे सुभाग का हल तलाश लेती हैं,
आयु की सटीक गणना से ज़्यादा
वे अख़बार के नीरस कोने का
कठिनतम सुडोकू हल कर लेती हैं

तुम्हारी कुटिल मुस्कुराहटों में
कहीं खो सी गई हैं प्रेमिकाएँ,
तुम्हारे ख़ुदपरस्त स्वार्थ में
कहीं बिखर सी गई हैं प्रेमिकाएँ

इससे पहले कि बुहार दी जाएँ वे
क़तरा-क़तरा समेटकर
फिर उठ खड़ी होती हैं

ये ही हैं वे प्रेमिकाएँ
ऐतिहासिक ग्रंथों में
नायक को अमर करने
सम्वादहीन चरित्र जी लेती हैं,
शेल्फ़ में सुस्ताती
किसी रामायण पर…
गर्द-सी सिमटी हुई
महाभारत पर…
एक वर्गज लाल सूती कपड़े-सी लिपटी हुईं।

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