‘Kamtar Main’, a poem by Rakhi Singh

अपने से छोटों को मैं प्रायः यह सलाह देती हूँ,
जो चाहो, सब करो।
न कर पाने की
कोई हताशा, कोई निराशा न रहे।
उम्र के इस पड़ाव पर मुझे दुख होता है
मैंने जो चाहा, वो कभी कर नहीं पायी।
घर, दुनिया, दुनियादारी, स्वभाव, व्यवहार, संस्कार के पाठ से ओतप्रोत मस्तिष्क
घिरा रहा संकोच की दीवारों में।
इच्छाओं, उत्सुकताओं का गला मन में ही घोंटा मैंने।

मुझे पछतावा है मेरे कमतर प्रयासों का
मुझे क्षोभ है
स्वयं पर लगाये अंकुशों का।
मैंने खुलकर कभी प्रेम नहीं किया
प्रेम किया तो स्वीकार नहीं कर पायी।

घृणा भी छुप छुपाकर की मैंने।
जिसे दिखाना चाहा उसकी मक्कारी का दर्पण
उसकी बातों के उत्तर मुस्कुरा कर दिए।
उसे जी-भर कोस भी नहीं पायी
भला-बुरा भी नहीं कहा कभी
जिसे चीख़कर गालियाँ देना चाहती रही।

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