लाॅकडाउन के दसवें दिन में
चिंटू लगा नज़ारे गिनने
पापा ने दरवाज़ा खोला
चिंटू फिर चहक के बोला-

‘खिड़की पे चिड़िया थी आयी
मैंने उसकी ड्राइंग बनायी
देखो पापा कैसी है?
क्या एकदम चिड़िया जैसी है?’

पापा ने फिर आँख मसल के
देखा उसको हर एंगल से
चटख रंग थे, तेज़ निगाहें
चिड़िया आती पर फैलाए
खिड़की, बादल, आसमान था
दृश्य वो सारा गतिमान था

पापा तो भौंचक्के थे
एकदम हक्के-बक्के थे
ख़ुशी से इतना फूल गए थे
ड्राइंग देख के झूल गए थे

अनायास क्या मन में आयी
‘रमा! रमा!’ आवाज़ लगायी
मम्मी लेकिन काम की मारी
थककर सोती थीं बेचारी
पापा ने कमरे में जाकर
मम्मी को कंधे से हिलाकर
बोला- ‘जो अपना लड़का है
मैं समझा था कड़का है
पर देखो उस ही लड़के ने
आज सवेरे तड़के में
क़ुदरत को अपना मित्र बनाया
कैसा सुन्दर चित्र बनाया’

तब तकिए से सर को उठाकर
मम्मी बोलीं कुछ मुस्काकर
‘मैंने ही चैलेंज दिया था
उस पे ऐसा तंज किया था –
पिंकी ही मुझको भाती है
कितना प्यारा गाती है!’

पापा एकदम सन्न-पटाएं
कुछ भी उनको समझ न आए
मम्मी ने आगे बतलाया
‘पिंकी ने कल गीत सुनाया
सच कहती हूँ जानूं तुमको
समझ सके न हम बच्चों को
इतने दिन हम भागे दौड़े
अपनों को ही पीछे छोड़े?’

पापा को ये समझ में आया
नया उन्होंने नियम बनाया
‘जितने दिन हैं घर के अन्दर
रहेंगे जैसे मस्त-कलन्दर
बच्चों ने भी क्या समझा है
कुकिंग का मैंने कोर्स किया है
अगर सेल्स में फँस न जाता
मैं भी मास्टर-शेफ़ में आता
काम का बोझा तुम मत ढोना
खाना-पीना मेरा ज़िम्मा!’

ऐसा कहकर पापा भागे
वाॅशरूम को, पेट दबाके
मम्मी ने फिर ड्राइंग उठायी
बच्चों को आवाज़ लगायी
उनको अपने पास बिठाया
अपना भी एक राज़ बताया
‘जब मैं पिंकी जितनी थी
मैं भी लिखा करती थी
कल जब इसने गीत सुनाया
मेरे भी मन में कुछ आया
अपनी कविता तुम्हें सुना दूँ
तुम दोनों को दोस्त बना लूँ?’

बच्चों ने झट हाँ कर डाली
मम्मी की आँखें भर डालीं
लगे चाव से कविता सुनने
लाॅकडाउन के दसवें दिन में…

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